महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भारत! तुम तपस्याका आश्रय लो! तपमें प्रवृत्त होनेपर तुम्हें शीघ्र ही देवराज इन्द्रका दर्शन होगा' ।। १४ ।। ततोऽहं वचनात् तस्य गिरिमारुह्य शैशिरम् । तपोऽतप्यं महाराज मासं मूलफलाशनः ।। १५ ।। महाराज! उनके इस आदेशको मानकर मैं हिमालय पर्वतपर आरूढ़ हो तपस्यामें संलग्न हो गया और एक मासतक केवल फल-फूल खाकर रहा ।। १५ ।। द्वितीयश्चापि मे मासो जलं भक्षयतो गतः । निराहारस्तृतीयेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ।। १६ ।। ऊर्ध्वबाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा । न च मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ।। १७ ।। इसी प्रकार मैंने दूसरा महीना भी केवल जल पीकर बिताया। पाण्डवनन्दन! तीसरे महीनेमें मैं पूर्णतः निराहार रहा। चौथे महीनेमें मैं ऊपरको हाथ उठाये खड़ा रहा। इतनेपर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ, यह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ।। १६-१७ ।। पञ्चमे त्वथ सम्प्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत् ।। १८ ।। पाँचवाँ महीना प्रारम्भ होनेपर जब एक दिन बीत गया तब दूसरे दिन एक शूकररूपधारी जीव मेरे निकट आया ।। १८ ।। निघ्नन् प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि । सम्मार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ।। १९ ।। वह अपनी थूथुनसे पृथ्वीपर चोट करता और पैरोंसे धरती खोदता था। बार-बार लेटकर वह अपने पेटसे वहाँकी भूमिको ऐसा स्वच्छ कर देता था, मानो उसपर झाड़ दिया गया हो ।। १९ ।। अनु तस्यापरं भूतं महत् कैरातसंस्थितम् । धनुर्बाणासिमत् प्राप्तं स्त्रीगणानुगतं तदा ।। २० ।। उसके पीछे किरात-जैसी आकृतिमें एक महान् पुरुषका दर्शन हुआ। उसने धनुष-बाण और खड्ग ले रखे थे। उसके साथ स्त्रियोंका एक समुदाय भी था ।। २० ।। ततोऽहं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद् भूतं लोमहर्षणम् ।। २१ ।। तब मैंने धनुष तथा अक्षय तरकस लेकर एक बाणके द्वारा उस रोमांचकारी सूकरपर आघात किया ।। युगपत् तं किरातस्तु विकृष्य बलवद् धनुः । अभ्याजघ्ने दृढतरं कम्पयन्निव मे मनः ।। २२ ।।