भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1133, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1133

साथ ही किरातने भी अपने सुदृढ़ धनुषको खींचकर उसपर गहरी चोटकी, जिससे मेरा हृदय कम्पित-सा हो उठा ॥ २२ ॥

स तु मामब्रवीद् राजन् मम पूर्वपरिग्रहः ।
मृगयाधर्ममुत्सृज्य किमर्थं ताडितस्त्वया ॥ २३ ॥
राजन्! फिर वह किरात मुझसे बोला—'यह सूअर तो पहले मेरा निशाना बन चुका था, फिर तुमने आखेटके नियमको छोड़कर उसपर प्रहार क्यों किया?' ॥ २३ ॥

एष ते निशितैर्बाणैर्दर्पं हन्मि स्थिरो भव ।
स धनुष्मान् महाकायस्ततो मामभ्यभाषत ॥ २४ ॥
इतना ही नहीं उस विशालकाय एवं धनुर्धर किरातने उस समय मुझसे यह भी कहा—'अच्छा, ठहर जाओ। मैं अपने पैने बाणोंसे अभी तुम्हारा घमंड चूर-चूर किये देता हूँ' ॥ २४ ॥

ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः ।
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ॥ २५ ॥
ऐसा कहकर उस भीलने जैसे पर्वतपर वर्षा हो, उस प्रकार महान् बाणोंकी बौछार करके मुझे सब ओरसे ढक दिया; तब मैंने भी भारी बाणवर्षा करके उसे सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ २५ ॥

ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनुमन्त्रितैः ।
प्रत्यविध्यमहं तं तु वज्रैरिव शिलोच्चयम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर जैसे वज्रसे पर्वतपर आघात किया जाय, उसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले अभिमन्त्रित और खूब खींचकर छोड़े हुए बाणोंद्वारा मैंने उसे बार-बार घायल किया ॥ २६ ॥

तस्य तच्छतधा रूपमभवच्च सहस्रधा ।
तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम् ॥ २७ ॥
उस समय उसके सैकड़ों और सहस्रों रूप प्रकट हुए और मैंने उसके सभी शरीरोंपर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७ ॥

पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत ।
अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुनः ॥ २८ ॥
भारत! फिर उसके वे सारे शरीर एकरूप दिखायी दिये। महाराज! उस एकरूपमें भी मैंने उसे पुनः अच्छी तरह घायल किया ॥ २८ ॥

अणुर्बृहच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिराः पुनः ।
एकीभूतस्तदा राजन् सोऽभ्यवर्तत मां युधि ॥ २९ ॥
यदाभिभवितुं बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे ।
ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ ॥ ३० ॥