महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1139, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिव्यानि चैव माल्यानि सुगन्धीनि नवानि च । शैशिरस्य गिरेः पादे प्रादुरासन् समीपतः ॥ ८ ॥ शत्रुविजयी नरेश! तदनन्तर जब वह दिन ढलने लगा, तब पुनः इस जगत्में नूतन जीवनका संचार-सा करती हुई पवित्र वायु चलने लगी और उस हिमालयके पार्श्ववर्ती प्रदेशमें दिव्य, नवीन और सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ ७-८ ॥ वादित्राणि च दिव्यानि सुघोराणि समन्ततः । स्तुतयश्चेन्द्रसंयुक्ता अश्रूयन्त मनोहराः ॥ ९ ॥ चारों ओर अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाले दिव्य वाद्यों और इन्द्रसम्बन्धी स्तोत्रोंके मनोहर शब्द सुनायी देने लगे ॥ ९ ॥ गणाश्चाप्सरसां तत्र गन्धर्वाणां तथैव च । पुरस्ताद् देवदेवस्य जगुर्गीतानि सर्वशः ॥ १० ॥ सब गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह वहाँ देवराज इन्द्रके आगे रहकर गीत गा रहे थे ॥ १० ॥ मरुतां च गणास्तत्र देवयानैरुपागमन् । महेन्द्रानुचरा ये च ये च सद्मनिवासिनः ॥ ११ ॥ देवताओंके अनेक गण भी दिव्य विमानोंपर बैठकर वहाँ आये थे। जो महेन्द्रके सेवक थे और जो इन्द्रभवनमें ही निवास करते थे, वे भी वहाँ पधारे ॥ ११ ॥ ततो मरुत्वान् हरिभिर्युक्तैर्वाहैः स्वलङ्कृतैः । शचीसहायस्तत्रायात् सह सर्वैस्तदामरैः ॥ १२ ॥ तदनन्तर थोड़ी ही देरमें विविध आभूषणोंसे विभूषित हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए एक सुन्दर रथके द्वारा शचीसहित इन्द्रने सम्पूर्ण देवताओंके साथ वहाँ पदार्पण किया ॥ १२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु कुबेरो नरवाहनः । दर्शयामास मां राजँल्लक्ष्म्या परमया युतः ॥ १३ ॥ राजन्! इसी समय सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य—लक्ष्मीसे सम्पन्न नरवाहन कुबेरने भी मुझे दर्शन दिया ॥ १३ ॥ दक्षिणस्यां दिशि यमं प्रत्यपश्यं व्यवस्थितम् । वरुणं देवराजं च यथास्थानमवस्थितम् ॥ १४ ॥ दक्षिण दिशाकी ओर दृष्टिपात करनेपर मुझे साक्षात् यमराज खड़े दिखायी दिये। वरुण और देवराज इन्द्र भी क्रमशः पश्चिम और पूर्व दिशामें यथास्थान खड़े हो गये ॥ १४ ॥ ते मामूचुर्महाराज सान्त्वयित्वा नरर्षभ । सव्यसाचिन् निरीक्षास्माँल्लोकपालानवस्थितान् ॥ १५ ॥ महाराज! नरश्रेष्ठ! उन सब लोकपालोंने मुझे सान्त्वना देकर कहा—‘सव्यसाची अर्जुन! देखो, हम सब लोकपाल यहाँ खड़े हैं ॥ १५ ॥