महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1140, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुरकार्यार्थसिद्ध्यर्थं दृष्टवानसि शङ्करम् । अस्मत्तोऽपि गृहाण त्वमस्त्राणीति समन्ततः ॥ १६ ॥ ‘देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये ही तुम्हें भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त हुआ था। अब तुम चारों ओर घूमकर हमलोगोंसे भी दिव्यास्त्र ग्रहण करो’ ॥ १६ ॥
ततोऽहं प्रयतो भूत्वा प्रणिपत्य सुरर्षभान् । प्रत्यगृह्णां तदास्त्राणि महान्ति विधिवद् विभो ॥ १७ ॥ प्रभो! तब मैंने एकाग्रचित्त हो उन उत्तम देवताओंको प्रणाम करके उन सबसे विधिपूर्वक महान् दिव्यास्त्र प्राप्त किये ॥ १७ ॥
गृहीतास्त्रस्ततो देवैरनुज्ञातोऽस्मि भारत । अथ देवा ययुः सर्वे यथागतमरिंदम ॥ १८ ॥ भारत! जब मैं अस्त्र ग्रहण कर चुका तब देवताओंने मुझे जानेकी आज्ञा दी। शत्रुदमन! तदनन्तर सब देवता जैसे आये थे, वैसे अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ १८ ॥
मघवानपि देवेशो रथमारुह्य सुप्रभम् । उवाच भगवान् स्वर्गं गन्तव्यं फाल्गुन त्वया ॥ १९ ॥ देवेश्वर भगवान् इन्द्रने भी अपने अत्यन्त प्रकाशपूर्ण रथपर आरूढ़ हो मुझसे कहा—‘अर्जुन! तुम्हें स्वर्गलोककी यात्रा करनी होगी ॥ १९ ॥
पुरैवागमनादस्माद् वेदाहं त्वां धनंजय । अतः परं त्वहं वै त्वां दर्शये भरतर्षभ ॥ २० ॥ ‘भरतश्रेष्ठ धनंजय! यहाँ आनेसे पहले ही मुझे तुम्हारे विषयमें सब कुछ ज्ञात हो गया था। इसके बाद मैंने तुम्हें दर्शन दिया है ॥ २० ॥
त्वया हि तीर्थेषु पुरा समाप्लावः कृतोऽसकृत् । तपश्चेदं महत् तप्तं स्वर्गं गन्तासि पाण्डव ॥ २१ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! तुमने पहले अनेक बार बहुत-से तीर्थोंमें स्नान किया है और इस समय इस महान् तपका भी अनुष्ठान कर लिया है, अतः तुम स्वर्गलोकमें सशरीर जानेके अधिकारी हो गये हो ॥ २१ ॥
भूयश्चैव च तप्तव्यं तपश्चरणमुत्तमम् । स्वर्गं त्ववश्यं गन्तव्यं त्वया शत्रुनिषूदन ॥ २२ ॥ ‘शत्रुसूदन! अभी तुम्हें और भी उत्तम तपस्या करनी है और स्वर्गलोकमें अवश्य पदार्पण करना है ॥ २२ ॥
मातलिर्मन्नियोगात् त्वां त्रिदिवं प्रापयिष्यति । विदितस्त्वं हि देवानां मुनीनां च महात्मनाम् ॥ २३ ॥ इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठ तपः कुर्वन् सुदुष्करम् ।