भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1141

‘मेरी आज्ञासे मातलि तुम्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा। पाण्डवश्रेष्ठ! यहाँ रहकर जो तुम अत्यन्त दुष्कर तप कर रहे हो, इसके कारण देवताओं तथा महात्मा मुनियोंमें तुम्हारी ख्याति बहुत बढ़ गयी है’ ।। २३ १/२ ।।

ततोऽहमब्रुवं शक्रं प्रसीद भगवन् मम । आचार्यं वरयेयं त्वामस्त्रार्थं त्रिदशेश्वर ।। २४ ।। तब मैंने देवराज इन्द्रसे कहा—‘भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न होइये। देवेश्वर! मैं अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये आपको अपना आचार्य बनाता हूँ’ ।। २४ ।।

इन्द्र उवाच

क्रूरकर्मास्त्रवित् तात भविष्यसि परंतप । यदर्थमस्त्राणीप्सुस्त्वं तं कामं पाण्डवाप्नुहि ।। २५ ।। इन्द्रने कहा—परंतप तात अर्जुन! दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर तुम भयंकर कर्म करने लगोगे। अतः पाण्डुनन्दन! मेरी इच्छा है कि तुम जिसके लिये अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हो, तुम्हारा वह उद्देश्य पूर्ण हो ।। २५ ।।

ततोऽहमब्रुवं नाहं दिव्यान्‍यस्त्राणि शत्रुहन् । मानुषेषु प्रयोक्ष्यामि विनास्त्रप्रतिघातनात् ।। २६ ।। यह सुनकर मैंने उत्तर दिया—‘शत्रुघाती देवेश्वर! मैं शत्रुओंद्धारा प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंका निवारण करनेके सिवा अन्य किसी अवसरपर मनुष्योंके ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग नहीं करूँगा ।। २६ ।।

तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रयच्छ विबुधाधिप । लोकांश्चास्त्रजितान् पश्चाल्लभैयं सुरपुङ्गव ।। २७ ।। ‘देवराज! सुरश्रेष्ठ! आप मुझे वे दिव्य अस्त्र प्रदान करें। अस्त्रविद्या सीखनेके पश्चात् मैं उन्हीं अस्त्रोंके द्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार प्राप्त करना चाहता हूँ’ ।। २७ ।।

इन्द्र उवाच

परीक्षार्थं मयैतत् ते वाक्यमुक्तं धनंजय । ममात्मजस्य वचनं सूपपन्नमिदं तव ।। २८ ।। इन्द्र बोले—धनंजय! मैंने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये उपर्युक्त बात कही थी। तुमने जो अस्त्रविद्याके प्रति अत्यन्त उत्सुकता प्रकट की है, वह तुम्हारे जैसे मेरे पुत्रके अनुरूप ही है ।। २८ ।।

शिक्ष मे भवनं गत्वा सर्वाण्यस्त्राणि भारत । वायोरग्नेर्वसुभ्योऽपि वरुणात् समरुद्गणात् ।। २९ ।। साध्यं पैतामहं चैव गन्धर्वोरगरक्षसाम् । वैष्णवानि च सर्वाणि नैर्ऋतानि तथैव च ।। ३० ।।