भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1142, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1142

मद्गतानि च जानीहि सर्वास्त्राणि कुरुद्वह ।
एवमुक्त्वा तु मां शक्रस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३१ ॥
भारत! तुम मेरे भवनमें चलकर सम्पूर्ण अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करो। कुरुश्रेष्ठ! वायु, अग्नि, वसु, वरुण, मरुद्गण, साध्यगण, ब्रह्मा, गन्धर्वगण, नाग, राक्षस, विष्णु तथा निर्ऋतिके और स्वयं मेरे भी सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करो, मुझसे ऐसा कहकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
अथापश्यं हरियुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् ।
दिव्यं मायामयं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ॥ ३२ ॥
तदनन्तर थोड़ी ही देरमें मुझे हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ वहाँ उपस्थित दिखायी दिया। राजन्! वह दिव्य मायामय पवित्र रथ मातलिके द्वारा नियन्त्रित था ॥ ३२ ॥
लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः ।
द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ॥ ३३ ॥
जब सभी लोकपाल चले गये, तब मातलिने मुझसे कहा—‘महातेजस्वी वीर! देवराज इन्द्र तुमसे मिलना चाहते हैं ॥ ३३ ॥
संसिद्धयस्व महाबाहो कुरु कार्यमनन्तरम् ।
पश्य पुण्यकृताँल्लोकान् सशरीरो दिवं व्रज ॥ ३४ ॥
‘महाबाहो! तुम उनसे मिलकर कृतार्थ होओ और अब आवश्यक कार्य करो। इसी शरीरसे देवलोकमें चलो तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंका दर्शन करो ॥ ३४ ॥
देवराजः सहस्राक्षस्त्वां दिदृक्षति भारत ।
इत्युक्तोऽहं मातलिना गिरिमामन्त्र्य शैशिरम् ॥ ३५ ॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् ।
‘भरतनन्दन! सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र तुम्हें देखना चाहते हैं।’ मातलिके ऐसा कहनेपर मैं हिमालयसे आज्ञा ले रथकी परिक्रमा करके उस श्रेष्ठ रथमें सवार हुआ ॥ ३५ १/२

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