भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1168

ताभिराभरणैः शब्दस्त्रासिताभिः समीरितः ।
शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत् तदा ॥ २४ ॥
उन डरी हुई निशाचरियोंके आभूषणोंके द्वारा उत्पन्न हुआ शब्द पर्वतोंपर पड़ती हुई शिलाओंके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥
वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् ।
बहुरत्नविचित्राणि शातकुम्भमयानि च ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वे भयभीत हुई दैत्यनारियाँ अपने-अपने घरोंमें घुस गयीं। उनके महल सोनेके बने हुए थे और अनेक प्रकारके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा होती थी ॥ २५ ॥
तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् ।
विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ॥ २६ ॥
वह उत्तम एवं अद्भुत नगर देवपुरीसे भी श्रेष्ठ दिखायी देता था। तब उसे देखकर मैंने मातलिसे पूछा— ॥ २६ ॥
इदमेवंविधं कस्माद् देवा नावासयन्त्युत ।
पुरंदरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षये ॥ २७ ॥
‘सारथे! देवतालोग ऐसा नगर क्यों नहीं बसाते हैं? यह नगर तो मुझे इन्द्रपुरीसे भी बढ़कर दिखायी देता है’ ॥ २७ ॥

मातलिरुवाच

आसीदिदं पुरा पार्थ देवराजस्य नः पुरम्
ततो निवातकवचैरितः प्रच्याविताः सुराः ॥ २८ ॥
**मातलि बोले—**पार्थ! पूर्वकालमें यह नगर हमारे देवराजके ही अधिकारमें था। फिर निवातकवचोंने आकर देवताओंको यहाँसे निकाल दिया ॥ २८ ॥
तपस्तप्त्वा महत् तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम्
इदं वृतं निवासाय देवेभ्यश्चाभयं युधि ॥ २९ ॥
उन्होंने अत्यन्त तीव्र तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और उनसे अपने रहनेके लिये यही नगर माँग लिया। साथ ही यह भी माँगा कि ‘हमें युद्धमें देवताओंसे भय न हो’ ॥ २९ ॥
ततः शक्रेण भगवान् स्वयम्भूरिति चोदितः
विधत्तां भगवानन्तमात्मनो हितकाम्यया ॥ ३० ॥
तब इन्द्रने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया—‘प्रभो! अपने (और हमारे) हितके लिये आप ही इन दानवोंका अन्त कीजिये’ ॥ ३० ॥
तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति भारत
भवितान्तस्त्वमप्येषां देहेनान्येन शत्रुहन् ॥ ३१ ॥