भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1169

भरतनन्दन! उनके ऐसा कहनेपर भगवान् ब्रह्माने कहा—'शत्रुदमन देवराज! इसमें दैवका यही विधान है कि तुम्हीं दूसरा शरीर धारण करके इन दानवोंका अन्त कर सकोगे' ॥ ३१ ॥
तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव
न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥ ३२ ॥
(अर्जुन! तुम्हीं इन्द्रके दूसरे स्वरूप हो।) इन दैत्योंके वधके लिये ही इन्द्रने तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये हैं। आज जो ये दानव तुम्हारे हाथों मारे गये हैं, इन्हें देवता नहीं मार सकते थे ॥ ३२ ॥
कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत
एषामन्तकः प्राप्तस्तत् त्वया च कृतं तथा ॥ ३३ ॥
भारत! समयके फेरसे ही तुम इनका विनाश करनेके लिये यहाँ आ पहुँचे हो और तुमने जैसा दैवका विधान था, उसके अनुसार इनका संहार कर डाला है ॥ ३३ ॥
दानवानां विनाशाय अस्त्राणां परमं बलम्
ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥ ३४ ॥
पुरुषोत्तम! देवराज इन्द्रने इन दानवोंके विनाशके उद्देश्यसे ही तुम्हें परम उत्तम अस्त्रबलकी प्राप्ति करायी है ॥ ३४ ॥

अर्जुन उवाच
ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान्
पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ॥ ३५ ॥
अर्जुन कहते हैं— महाराज! इस प्रकार उन दानवोंका संहार करके नगरमें शान्ति स्थापित करनेके पश्चात् मैं मातलिके साथ पुनः उस देवलोकको लौट आया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि निवातकवचयुद्धे
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥