महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भरतनन्दन! उनके ऐसा कहनेपर भगवान् ब्रह्माने कहा—'शत्रुदमन देवराज! इसमें दैवका यही विधान है कि तुम्हीं दूसरा शरीर धारण करके इन दानवोंका अन्त कर सकोगे' ॥ ३१ ॥
तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव
न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥ ३२ ॥
(अर्जुन! तुम्हीं इन्द्रके दूसरे स्वरूप हो।) इन दैत्योंके वधके लिये ही इन्द्रने तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये हैं। आज जो ये दानव तुम्हारे हाथों मारे गये हैं, इन्हें देवता नहीं मार सकते थे ॥ ३२ ॥
कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत
एषामन्तकः प्राप्तस्तत् त्वया च कृतं तथा ॥ ३३ ॥
भारत! समयके फेरसे ही तुम इनका विनाश करनेके लिये यहाँ आ पहुँचे हो और तुमने जैसा दैवका विधान था, उसके अनुसार इनका संहार कर डाला है ॥ ३३ ॥
दानवानां विनाशाय अस्त्राणां परमं बलम्
ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥ ३४ ॥
पुरुषोत्तम! देवराज इन्द्रने इन दानवोंके विनाशके उद्देश्यसे ही तुम्हें परम उत्तम अस्त्रबलकी प्राप्ति करायी है ॥ ३४ ॥
अर्जुन उवाच
ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान्
पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ॥ ३५ ॥
अर्जुन कहते हैं— महाराज! इस प्रकार उन दानवोंका संहार करके नगरमें शान्ति स्थापित करनेके पश्चात् मैं मातलिके साथ पुनः उस देवलोकको लौट आया ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि निवातकवचयुद्धे
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥
१७३-
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन
अर्जुन उवाच
निवर्तमानेन मया महद् दृष्टं ततोऽपरम्।
पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तत्पश्चात् लौटते समय मार्गमें मैंने एक दूसरा दिव्य एवं विशाल नगर देखा, जो अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपने निवासियोंकी इच्छाके अनुसार सर्वत्र आ-जा सकता था ॥ १ ॥
रत्नद्रुममयैश्चित्रैः सुस्वरैश्च पतत्त्रिभिः।
पौलोमैः कालकञ्जैश्च नित्यहृष्टै रधिष्ठितम् ॥ २ ॥
विचित्र रत्नमय वृक्ष और मधुर स्वरमें बोलनेवाले पक्षी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे। पौलोम और कालकञ्ज नामक दानव सदा प्रसन्नतापूर्वक वहाँ निवास करते थे ॥ २ ॥
गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम्।
सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥
उस नगरमें ऊँचे-ऊँचे गोपुरोंसहित सुन्दर अट्टालिकायें सुशोभित थीं। उसमें चारों दिशाओंमें एक-एक करके चार फाटक लगे थे। शत्रुओंके लिये उस नगरमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था। सब प्रकारके रत्नोंसे निर्मित वह दिव्य नगर अद्भुत दिखायी देता था ॥ ३ ॥
द्रुमैः पुष्पफलोपेतैः सर्वरत्नमयैर्वृतम्।
तथा पतत्त्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः ॥ ४ ॥
फल और फूलोंसे भरे हुए सर्वरत्नमय वृक्ष नगरको सब ओरसे घेरे हुए थे तथा वह नगर दिव्य एवं अत्यन्त मनोहर पक्षियोंसे युक्त था ॥ ४ ॥
असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलायुधैः।
चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ॥ ५ ॥
सदा प्रसन्न रहनेवाले बहुत-से असुर गलेमें सुन्दर माला धारण किये और हाथोंमें शूल, ऋष्टि, मुसल, धनुष तथा मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र लिये सब ओरसे घेरकर उस नगरकी रक्षा करते थे ॥ ५ ॥
तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम्।
अपृच्छं मातलिं राजन् किमिदं वर्ततेऽद्भुतम् ॥ ६ ॥
राजन्! दैत्योंके उस अद्भुत दिखायी देनेवाले नगरको देखकर मैंने मातलिसे पूछा—‘सारथे! यह कौन-सा अद्भुत नगर है?’ ।। ६ ।।
मातलिरुवाच
पुलोमा नाम दैतेयी कालका च महासुरी
दिव्यं वर्षसहस्रं ते चेरतुः परमं तपः ।। ७ ।।
तपसोऽन्ते ततस्ताभ्यां स्वयम्भूरदद् वरम्
अगृह्णीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम् ।। ८ ।।
मातलिने कहा—पार्थ! दैत्यकुलकी कन्या पुलोमा तथा महान् असुरवंशकी कन्या कालका—उन दोनोंने एक हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपस्या पूर्ण होनेपर भगवान् ब्रह्माजीने उन दोनोंको वर दिया। उन्होंने यही वर माँगा कि ‘हमारे पुत्रोंका दुःख दूर हो जाय’ ।। ७-८ ।।
अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगैः
पुरं सुरमणीयं च खचरं सुमहाप्रभम् ।। ९ ।।
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि
महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसैः ।। १० ।।
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम्
ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम् ।। ११ ।।
तदेतत् खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम्
पौलोमाध्युषितं वीर कालकञ्जैश्च दानवैः ।। १२ ।।
राजेन्द्र! उन दोनोंने यह भी प्रार्थना की कि ‘हमारे पुत्र देवता, राक्षस तथा नागोंके लिये भी अवध्य हों। इनके रहनेके लिये एक सुन्दर नगर होना चाहिये, जो अपने महान् प्रभा-पुञ्जसे जगमगा रहा हो। वह नगर विमानकी भाँति आकाशमें विचरनेवाला होना चाहिये, उसमें सब प्रकारके रत्नोंका संचय रहना चाहिये, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर तथा राक्षस कोई भी उसका विध्वंस न कर सके। वह नगर समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न, शोक शून्य तथा रोग आदिसे रहित होना चाहिये।’ भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने कालकेयोंके लिये वैसे ही नगरका निर्माण किया था। यह वही आकाशचारी दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरता है। इसमें देवताओंका प्रवेश नहीं है। वीरवर! इसमें पौलोम और कालकंज नामक दानव ही निवास करते हैं ।। ९—१२ ।।
हिरण्यपुरमित्येवं ख्यायते नगरं महत्
रक्षितं कालकेयैश्च पौलोमैश्च महासुरैः ।। १३ ।।
यह विशाल नगर हिरण्यपुरके नामसे विख्यात है। कालकेय तथा पौलोम नामक महान् असुर इसकी रक्षा करते हैं ।। १३ ।।
त एते मुदिता राजन्नवध्याः सर्वदैवतैः निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः ॥ १४ ॥ राजन्! ये वे ही दानव हैं, जो सम्पूर्ण देवताओंसे अवध्य रहकर उद्वेग तथा उत्कण्ठासे रहित हो यहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं॥ १४॥ मानुषान्मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो ब्रह्मणा पुरा एतानपि रणे पार्थ कालकञ्जान् दुरासदान् वज्रास्त्रेण नयस्वाशु विनाशं सुमहाबलान् ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मनुष्यके हाथसे इनकी मृत्यु निश्चित की थी। कुन्तीकुमार! ये कालकंज और पौलोम अत्यन्त बलवान् तथा दुर्धर्ष हैं। तुम युद्धमें वज्रास्त्रके द्वारा इनका भी शीघ्र ही संहार कर डालो ॥ १५ ॥
अर्जुन उवाच सुरासुरैरवध्यं तदहं ज्ञात्वा विशाम्पते अब्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत् पुरमञ्जसा ॥ १६ ॥ अर्जुन बोले—राजन्! उस हिरण्यपुरको देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य जानकर मैंने मातलिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—'आप यथाशीघ्र इस नगरमें अपना रथ ले चलिये' ॥ १६ ॥ त्रिदशेशद्विषो यावत् क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम् न कथञ्चिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विषः ॥ १७ ॥ 'जिससे देवराजके द्रोहियोंको मैं अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर डालूँ। जो देवताओंसे द्वेष रखते हैं, उन पापियोंको मैं किसी प्रकार मारे बिना नहीं छोड़ सकता' ॥ १७ ॥ उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् रथेन तेन दिव्येन हरियुक्तेन मातलिः ॥ १८ ॥ मेरे ऐसा कहनेपर मातलिने घोड़ोंसे युक्त उस दिव्य रथके द्वारा मुझे शीघ्र ही हिरण्यपुरके निकट पहुँचा दिया ॥ १८ ॥ ते मामालक्ष्य दैतेया विचित्राभरणाम्बराः समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय दंशिताः ॥ १९ ॥ मुझे देखते ही विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वे दैत्य कवच पहनकर अपने रथोंपर जा बैठे और बड़े वेगसे मेरे ऊपर टूट पड़े ॥ १९ ॥ ततो नालीकनाराचैर्भल्लैः शक्त्यृष्टितोमरैः प्रत्यघ्नन् दानवेन्द्रा मां क्रुद्धास्तीव्रपराक्रमाः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन प्रचण्ड पराक्रमी दानवेन्द्रोंने नालीक, नाराच, भल्ल, शक्ति, ऋष्टि तथा तोमर आदि अस्त्रोंद्वारा मुझे मारना आरम्भ किया ॥ २० ॥
तदहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारयम् शस्त्रवर्षं महत् राजन् विद्याबलमुपाश्रितः ॥ २१ ॥ व्यामोहयं च तान् सर्वान् रथमार्गैश्चरन् रणे तेऽन्योन्यमभिसम्मूढाः पातयन्ति स्म दानवान् ॥ २२ ॥ राजन्! उस समय मैंने विद्या-बलका आश्रय लेकर महती बाण-वर्षाके द्वारा उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी भारी बौछारको रोका और युद्ध-भूमिमें रथके विभिन्न पैंतरे बदलकर विचरते हुए उन सबको मोहमें डाल दिया। वे ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे कि आपसमें ही लड़कर एक-दूसरे दानवोंको धराशायी करने लगे ॥ २१-२२ ॥
तेषामेवं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम् शिरांसि विशिखैर्दीप्तैर्न्यहनं शतसङ्घशः ॥ २३ ॥ इस प्रकार मूढ़चित्त हो आपसमें ही एक-दूसरेपर धावा करनेवाले उन दानवोंके सौ-सौ मस्तकोंको मैं अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगा ॥ २३ ॥
ते वध्यमाना दैतेयाः पुरमास्थाय तत् पुनः खमुत्पेतुः सनगरा मायामास्थाय दानवीम् ॥ २४ ॥ वे दैत्य जब इस प्रकार मारे जाने लगे, तब पुनः अपने उस नगरमें ही घुस गये और दानवी मायाका सहारा ले नगर सहित आकाशमें ऊँचे उड़ गये ॥ २४ ॥
ततोऽहं शरवर्षेण महता कुरुनन्दन मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारयम् ॥ २५ ॥ कुरुनन्दन! तब मैं बाणोंकी भारी बौछार करके दैत्योंका मार्ग रोक लिया और उनकी गति कुण्ठित कर दी ॥ २५ ॥
तत् पुरं खचरं दिव्यं कामगं सूर्यसप्रभम् दैतेयैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ॥ २६ ॥ सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला दैत्योंका वह आकाशचारी दिव्य नगर उनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला था और दैत्यलोग वरदानके प्रभावसे उसे सुखपूर्वक आकाशमें धारण करते थे ॥ २६ ॥
अन्तर्भूभौ निपतति पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते पुनस्तिर्यक् प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥ वह दिव्य पुर कभी पृथ्वीपर अथवा पातालमें चला जाता, कभी ऊपर उड़ जाता, कभी तिरछी दिशाओंमें चलता और कभी शीघ्र ही जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
अमरावतीसंकाशं तत् पुरं कामगं महत् अहमस्त्रैर्बहुविधैः प्रत्यगृह्णं परंतप ॥ २८ ॥ परंतप! इच्छानुसार विचरनेवाला वह विशाल नगर अमरावतीके ही तुल्य था; परंतु मैंने नाना प्रकारके अस्त्रों द्वारा उसे सब ओरसे रोक लिया ॥ २८ ॥
ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रनुदितेन च
व्यगृह्णां सह दैत्यैस्तत् पुरं पुरुषर्षभ ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ! फिर दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हुए मैंने दैत्योंसहित उस नगरको क्षत-विक्षत करना आरम्भ किया ॥ २९ ॥
विक्षतं चायसैर्बाणैर्मत्प्रयुक्तैरजिह्मगैः
महीमभ्यपतद् राजन् प्रभग्नं पुरमासुरम् ॥ ३० ॥
राजन्! मेरे चलाये हुए लोहनिर्मित बाण सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले थे। उनसे क्षतिग्रस्त हुआ वह दैत्य-नगर तहस-नहस होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३० ॥
ते वध्यमाना मद्बाणैर्वज्रवेगैरयस्मयैः
पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुराः कालचोदिताः ॥ ३१ ॥
महाराज! लोहेके बने हुए मेरे बाणोंका वेग वज्रके समान था। उनकी मार खाकर वे कालप्रेरित असुर चारों ओर चक्कर काटने लगते थे ॥ ३१ ॥
**ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलिरा Copied... -> ततो मातलि
प्रत्यदृश्यन्त संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः
वे महान् बलवान् तो थे ही, रथके विचित्र पैंतरे बदलकर रणभूमिमें विचर रहे थे। उस युद्धके मैदानमें उनके सौ-सौ और हजार-हजारके झुंड दिखायी देते थे॥ ३६१/२॥
विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः ।। ३७ ।।
विचित्राभरणाश्चैव नन्दयन्तीव मे मनः
उनके मस्तकोंपर विचित्र मुकुट और पगड़ी देखी जाती थी। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र ही थे। वे अद्भुत आभूषणोंसे विभूषित हो मेरे लिये मनोरंजनकी-सी वस्तु बन गये थे॥ ३७१/२॥
अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रचोदितै रणे ।। ३८ ।।
नाशक्नुवं पीडयितुं ते तु मां प्रत्यपीडयन्
उस युद्धमें दिव्यास्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित बाणोंकी वर्षा करके भी मैं उन्हें पीड़ित न कर सका; परंतु वे मुझे बहुत पीड़ा देने लगे॥ ३८१/२॥
तैः पीड्यमानो बहुभिः कृतास्त्रैः कुशलैर्युधि ।। ३९ ।।
व्यथितोऽस्मि महायुद्धे भयं चागान्महन्मम
वे अस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धकुशल थे, उनकी संख्या भी बहुत थी। उस महान् संग्राममें उन दानवोंसे पीड़ित होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया॥ ३९१/२॥
ततोऽहं देवदेवाय रुद्राय प्रयतो रणे ।। ४० ।।
(प्रयतः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने ।)
स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समचोदयम्
तब मैंने एकाग्रचित्त हो मस्तक झुकाकर देवाधिदेव महात्मा रुद्रको प्रणाम किया और ‘समस्त भूतोंका कल्याण हो’ ऐसा कहकर उनके महान् पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया॥ ४०१/२॥
यत् तद् रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् ।। ४१ ।।
(महत् पाशुपतं दिव्यं सर्वलोकनमस्कृतम् ।)
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम्
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् ।। ४२ ।।
उसीको ‘रौद्रास्त्र’ भी कहते हैं। वह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। वह महान् एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय है। उसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ, जिनके तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र तथा छः भुजाएँ थीं। उनका स्वरूप बड़ा तेजस्वी था। उनके मस्तकके बाल सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे॥ ४१-४२॥
लेलिहानैर्महानागैः कृतचीरममित्रहन्
(भक्तानुकम्पिनं देवं नागयज्ञोपवीतिनम् ।) विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् ॥ ४३ ॥ दृष्ट्वा गाण्डीवसंयोगमानीय भरतर्षभ नमस्कृत्य त्रिनेत्राय शर्वायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ मुक्तवान् दानवेन्द्राणां पराभावाय भारत मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन् रूपाण्यासन् सहस्रशः ॥ ४५ ॥ शत्रुदमन नरेश! लपलपाती जीभवाले बड़े-बड़े नाग उन दिव्य पुरुषके लिये चीर (वस्त्र) बने हुए थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवजीने सर्पोंका ही यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनके दर्शनसे मेरा सारा भय जाता रहा। भरतश्रेष्ठ! फिर तो मैंने उस भयंकर एवं सनातन पाशुपतास्त्रको गाण्डीव धनुषपर संयोजित करके अमित तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरको नमस्कार किया और उन दानवेन्द्रोंके विनाशके लिये उनपर चला दिया। उस अस्त्रके छूटते ही उससे सहस्रों रूप प्रकट हो गये ॥ ४३—४५ ॥ मृगाणामथ सिंहानां व्याघ्राणां च विशाम्पते ऋक्षाणां महिषाणां च पन्नगानां तथा गवाम् ॥ ४६ ॥ शरभाणां गजानां च वानराणां च सङ्घशः ऋषभाणां वराहाणां मार्जाराणां तथैव च ॥ ४७ ॥ शालावृकाणां प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः गृध्राणां गरुडानां च चमराणां तथैव च ॥ ४८ ॥ देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वाणां च सर्वशः पिशाचानां सयक्षाणां तथैव च सुरद्विषाम् ॥ ४९ ॥ गुह्यकानां च संग्रामे नैर्ऋतानां तथैव च झषाणां गजवक्त्राणामुलूकानां तथैव च ॥ ५० ॥ मीनवाजिसरूपाणां नानाशस्त्रासिपाणिनाम् तथैव यातुधानानां गदामुद्गरधारिणाम् ॥ ५१ ॥ महाराज! मृग, सिंह, व्याघ्र, रीछ, भैंस, नाग, गौ, शरभ, हाथी, वानर, बैल, सूअर, बिलाव, भेड़िये, प्रेत, मुरुण्ड, गिद्ध, गरुड, चमरी गाय, देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, देवद्रोही राक्षस, गुह्यक, निशाचर, मत्स्य, गजमुख, उल्लू, मीन तथा अश्व-जैसे रूपवाले नाना प्रकारके जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन सबके हाथमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र एवं खड्ग थे। इसी प्रकार गदा और मुद्गर धारण किये बहुत-से यातुधान भी प्रकट हुए ॥ ४६—५१ ॥ एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नानारूपधरैस्तथा सर्वमासीज्जगद् व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ॥ ५२ ॥ त्रिशिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः
अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभिः ।। ५३ ।।
इन सबके साथ दूसरे भी बहुत-से जीवोंका प्राकट्य हुआ, जिन्होंने नाना प्रकारके रूप धारण कर रखे थे। उन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त-सा हो गया था। पाशुपतास्त्रका प्रयोग होते ही कोई तीन मस्तक, कोई चार दाढ़ें, कोई चार मुख और कोई चार भुजावाले अनेक रूपधारी प्राणी प्रकट हुए, जो मांस, मेदा, वसा और हड्डियोंसे संयुक्त थे ।। ५२-५३ ।।
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा नाशमागताः
अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः ।। ५४ ।।
अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणैः
न्यहनं दानवान् सर्वान् मुहूर्तेनैव भारत ।। ५५ ।।
उन सबके द्वारा गहरी मार पड़नेसे वे सारे दानव नष्ट हो गये। भारत! उस समय सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी तथा वज्र और अशनिके समान प्रकाशित होनेवाले शत्रुविनाशक लोहमय बाणोंद्वारा भी मैंने दो ही घड़ीमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला ।। ५४-५५ ।।
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान् गतासून् नभसश्च्युतान्
दृष्ट्वाहं प्रणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे ।। ५६ ।।
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए अस्त्रोंद्वारा क्षत-विक्षत हो समस्त दानव प्राण त्यागकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। यह देखकर मैंने पुनः त्रिपुरनाशक भगवान् शंकरको प्रणाम किया ।। ५६ ।।
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान् दिव्याभरणभूषितान्
निशम्य परमं हर्षमगमद् देवसारथिः ।। ५७ ।।
दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दानव पाशुपतास्त्रसे पिस गये हैं, यह देखकर देवसारथि मातलिको बड़ा हर्ष हुआ ।। ५७ ।।
तदसह्यं कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम्
दृष्ट्वा मां पूजयामास मातलिः शक्रसारथिः ।। ५८ ।।
जो कार्य देवताओंके लिये भी दुष्कर और असह्य था, वह मेरेद्वारा पूरा हुआ देख इन्द्रसारथि मातलिने मेरा बड़ा सम्मान किया ।। ५८ ।।
उवाच वचनं चेदं प्रीयमाणः कृताञ्जलिः
सुरासुरैरसह्यं हि कर्म यत् साधितं त्वया ।। ५९ ।।
और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर कहा—'अर्जुन! आज तुमने वह कार्य कर दिखाया है जो देवताओं और असुरोंके लिये भी असाध्य था ।। ५९ ।।
न ह्येतत् संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः
(ध्रुवं धनंजय प्रीतस्त्वयि शक्रः पुरार्दन ।)
सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत् खगं महत् ।। ६० ।।
त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात्
‘साक्षात् देवराज इन्द्र भी युद्धमें यह सब कार्य करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं।
हिरण्यपुरका विनाश करनेवाले वीरवर धनंजय! निश्चय ही देवराज इन्द्र आज तुम्हारे ऊपर
बहुत प्रसन्न होंगे। वीर! तुमने अपने पराक्रम और तपस्याके बलसे इस आकाशचारी विशाल
नगरको तहस-नहस कर डाला, जिसे सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी नष्ट नहीं कर
सकते थे' ।। ६० ।।
विध्वस्ते खपुरे तस्मिन् दानवेषु हतेषु च ।। ६१ ।।
विनदन्त्यः स्त्रियः सर्वा निष्पेतुर्नगराद् बहिः
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुखिताः ।। ६२ ।।
उस आकाशवर्ती नगरका विध्वंस और दानवोंका संहार हो जानेपर वहाँकी सारी
स्त्रियाँ विलाप करती हुई नगरसे बाहर निकल आयीं। उनके केश बिखरे हुए थे। वे दुःख
और व्यथामें डूबी हुई कुररीकी भाँति करुण-क्रन्दन करती थीं ।। ६१-६२ ।।
पेतुः पुत्रान् पितॄन् भ्रातृन् शोचमाना महीतले
रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वराः ।। ६३ ।।
उरांसि परिनिघ्नन्त्यो विस्रस्तस्रग्विभूषणाः
अपने पुत्र, पिता और भाइयोंके लिये शोक करती हुई वे सब-की-सब पृथ्वीपर गिर
पड़ीं। जिनके पति मारे गये थे, वे अनाथ अबलाएँ दीनतापूर्ण कष्टसे रोती-चिल्लाती हुई
छाती पीट रही थीं। उनके हार और आभूषण इधर-उधर गिर पड़े थे ।। ६३ ।।
तच्छोकयुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् ।। ६४ ।।
न बभौ दानवपुरं हतत्त्विट्कं हतेश्वरम्
गन्धर्वनगराकारं हतनागमिव ह्रदम् ।। ६५ ।।
शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत् पुरम्
दानवोंका वह नगर शोकमग्न हो अपनी सारी शोभा खो चुका था। वहाँ दुःख और
दीनता व्याप्त हो रही थी। अपने प्रभुओंके मारे जानेसे वह दानव-नगर निष्प्रभ और
अशोभनीय हो गया था। गन्धर्व-नगरकी भाँति उसका अस्तित्व अयथार्थ जान पड़ता था।
जिसका हाथी मर गया हो, उस सरोवर और जहाँके वृक्ष सूख गये हों, उस वनके समान वह
नगर अदर्शनीय हो गया था ।। ६४-६५ ।।
मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरा नयत् ।। ६६ ।।
देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात्
मेरे मनमें तो हर्ष और उत्साह भरा हुआ था। मैंने देवताओंका कार्य पूरा कर दिया था।
अतः मातलि उस रणभूमिसे मुझे शीघ्र ही देवराज इन्द्रके भवनमें ले आये ।। ६६ ।।
हिरण्यपुरमुत्सृज्य निहत्य च महासुरान् ।। ६७ ।।
निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम्
इस प्रकार मैं निवातकवच नामक महादानवोंको (तथा पौलोम और कालकेयोंको)
मारकर तथा उजड़े हुए हिरण्यपुरको उसी अवस्थामें छोड़कर वहाँसे इन्द्रके पास
आया ।। ६७ १/२ ।।
मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् ।। ६८ ।।
सर्वं विश्रावयामास यथाभूतं महाद्युते
महाद्युते! मातलिने मेरा सारा कार्य, जो कुछ जैसे हुआ था, देवराज इन्द्रसे
विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।।
हिरण्यपुरघातं च मायानां च निवारणम् ।। ६९ ।।
निवातकवचानां च वधं संख्ये महौजसाम्
तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सहस्राक्षः पुरंदरः ।। ७० ।।
मरुद्भिः सहितः श्रीमान् साधु साध्वित्यथाब्रवीत्
(परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय सस्मितम् ।)
ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः ।। ७१ ।।
अब्रवीद् विबुधैः सार्धमिदं स मधुरं वचः
अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे ।। ७२ ।।
हिरण्यपुरका विध्वंस, दानवी मायाका निवारण तथा महाबलवान् निवातकवचोंका
युद्धमें वध सुनकर मरुत् आदि देवताओंसहित भगवान् सहस्रलोचन इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो
मुझे साधुवाद देने लगे और मुझे प्रेम पूर्वक हृदयसे लगाकर मुसकराते हुए मेरा मस्तक
सूँघा। तत्पश्चात् देवराजने बार-बार मुझे सान्त्वना देते हुए देवताओंके साथ यह मधुर वचन
कहा—'पार्थ! तुमने युद्धमें वह कार्य किया है, जो देवताओं और असुरोंके लिये भी
असम्भव है ।। ६९–७२ ।।
गुर्वर्थश्च कृतः पार्थ महाशत्रून् घ्नता मम
एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनंजय ।। ७३ ।।
असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम्
अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः ।। ७४ ।।
‘आज तुमने मेरे महान् शत्रुओंका संहार करके गुरुदक्षिणा चुका दी है। धनंजय! इसी
प्रकार तुम्हें सदा युद्धभूमिमें अविचल रहना चाहिये और मोहशून्य होकर अस्त्रोंका प्रयोग
करना चाहिये। देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी युद्धमें तुम्हारा सामना नहीं कर
सकता ।। ७३-७४ ।।
सयक्षासुरगन्धर्वैः सपक्षिगणपन्नगैः
वसुधां चापि कौन्तेय त्वद्बाहुबलनिर्जिताम्
पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ७५ ।।
'यक्ष, असुर, गन्धर्व, पक्षी तथा नाग भी तुम्हारे सामने नहीं टिक सकते। कुन्तीकुमार! धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तुम्हारे बाहुबलसे जीती हुई पृथ्वीका पालन करेंगे ।। ७५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि हिरण्यपुरदैत्यवधे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें हिरण्यपुरवासी दैत्योंके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७३ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७७ १/२ श्लोक हैं)
१७४-
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
अर्जुन उवाच
ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्
देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
अर्जुन कहते हैं—राजन्! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया। धीरे-धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये। तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा— ॥ १ ॥
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥ २ ॥
‘भरतनन्दन! तुममें सब दिव्यास्त्र विद्यमान हैं। भूमण्डलका कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता ॥ २ ॥
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः
संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३ ॥
‘बेटा! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा राजाओंसहित शकुनि—ये सब-के-सब संग्राममें खड़े होनेपर तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते’ ॥ ३ ॥
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥ ४ ॥
महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी ॥ ४ ॥
देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम्
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने बड़े जोरकी आवाज करनेवाला यह देवदत्त नामक शंख प्रदान किया। स्वयं देवराज इन्द्रने ही यह दिव्य किरीट मेरे मस्तकपर रखा था ॥ ५ ॥
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये ॥ ६ ॥
एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥ ७ ॥ महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ७ ॥
ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥ ८ ॥ तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'अर्जुन! अब तुम्हारे जानेका समय आ गया है; क्योंकि तुम्हारे भाई तुम्हें बहुत याद करते हैं' ॥ ८ ॥
एवमिन्द्रस्य भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥ ९ ॥ भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं ॥ ९ ॥
ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम् गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥ १० ॥ इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥ ११ ॥ दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ ॥ १२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। भारत! यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुमने देवताओंके स्वामी राजराजेश्वर इन्द्रको आराधनाद्वारा प्रसन्न कर लिया। निष्पाप परंतप! सबसे बड़ी सौभाग्यकी बात तो यह है कि तुमने देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् शंकरका दर्शन किया और उन्हें अपनी युद्धकलासे संतुष्ट कर लिया ॥ ११-१२ ॥
दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! समस्त लोकपालोंके साथ तुम्हारी भेंट हुई, यह भी हमारे लिये सौभाग्यका सूचक है। हमारा अहोभाग्य है कि हम उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहे हैं। अर्जुन! हमारे भाग्यसे ही तुम पुनः हमारे पास लौट आये ॥ १३ ॥
अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्
मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥ १४ ॥
आज मुझे यह विश्वास हो गया कि हम नगरोंसे सुशोभित समूची वसुधादेवीको जीत लेंगे। अब हम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भी अपने वशमें पड़ा हुआ ही मानते हैं ॥ १४ ॥
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हतः ॥ १५ ॥
भारत! अब मेरी इच्छा उन दिव्यास्त्रोंको देखनेकी हो रही है, जिनके द्वारा तुमने उस प्रकारके उन महापराक्रमी निवातकवचोंका विनाश किया है ॥ १५ ॥
अर्जुन उवाच
श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः
निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥ १६ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! कल सबेरे आप उन सब दिव्यास्त्रोंको देखियेगा जिनके द्वारा मैंने भयानक निवातकवचोंको मार गिराया है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः
भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥
१७५-
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना
वैशम्पायन उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धर्मराजो युधिष्ठिरः
उत्थायावश्यककार्याणि कृतवान् भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब वह रात बीत गयी तब धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयोंसहित उठकर आवश्यक नित्यकर्म पूरे किये ॥ १ ॥
ततः संचोदयामास सोऽर्जुनं भ्रातृनन्दनम्
दर्शयास्त्राणि कौन्तेय यैर्जिता दानवास्त्वया ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने भाइयोंको सुख पहुँचानेवाले अर्जुनको आज्ञा दी—'कुन्तीनन्दन! अब तुम उन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कराओ जिनसे तुमने दानवोंपर विजय पायी है' ॥ २ ॥
ततो धनंजयो राजन् देवैर्दत्तानि पाण्डवः
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शयामास भारत ॥ ३ ॥
राजन्! तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने देवताओंके दिये हुए उन दिव्य अस्त्रोंको दिखानेका आयोजन किया ॥ ३ ॥
यथान्यायं महातेजाः शौचं परममास्थितः
(नमस्कृत्य त्रिनेत्राय वासवाय च पाण्डवः ।)
गिरिकूबरपादाक्षं शुभवेणु त्रिवेणुमत् ॥ ४ ॥
पार्थिवं रथमास्थाय शोभमानो धनंजयः
दिव्येन संवृतस्तेन कवचेन सुवर्चसा ॥ ५ ॥
धनुरादाय गाण्डीवं देवदत्तं स वारिजम्
शोशुभ्यमानः कौन्तेय आनुपूर्व्यान्महाभुजः ॥ ६ ॥
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे
अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै ॥ ७ ॥
समाक्रान्ता मही पद्भ्यां समकम्पत सद्रुमा
क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः ॥ ८ ॥
महातेजस्वी अर्जुन पहले तो विधिपूर्वक स्नान करके शुद्ध हुए। फिर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और इन्द्रको नमस्कार करके उन्होंने वह अत्यन्त तेजस्वी दिव्य कवच धारण किया। तत्पश्चात् वे पृथ्वीरूपी रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे। पर्वत ही उस रथका कूबर था, दोनों पैर ही पहिये थे और सुन्दर बाँसोंका वन ही त्रिवेणु (रथके अंगविशेष)-का काम देता था। तदनन्तर महाबाहु कुन्तीनन्दन अर्जुनने एक हाथमें गाण्डीव धनुष और
दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमशः उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी। नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया ।। ४-८ ।। शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः। न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वल च पावकः ॥ ९ ॥ पर्वत विदीर्ण होने लगे और हवाकी गति रुक गयी। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आगका जलना बंद हो गया ॥ ९ ॥ न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय ॥ १० ॥ पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन् वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः ॥ ११ ॥ दह्यमानास्तदास्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम् ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः ॥ १२ ॥ जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः ॥ १३ ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥ १४ ॥ द्विजातियोंको किसी प्रकार भी वेदोंका भान नहीं हो पाता था। जनमेजय! भूमिके भीतर जो प्राणी निवास करते थे, वे भी पीड़ित हो उठे और अर्जुनको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये। उन सबके मुखपर विकृति आ गयी थी। वे हाथ जोड़े हुए थर-थर काँप रहे थे और अस्त्रोंके तेजसे संतप्त हो धनंजयसे प्राणोंकी भिक्षा माँग रहे थे। इसी समय ब्रह्मर्षि, सिद्ध महर्षि, समस्त जंगम प्राणी, श्रेष्ठ देवर्षि, देवता, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पक्षी तथा आकाशचारी प्राणी सभी वहाँ आकर उपस्थित हो गये ।। १०-१४ ।। ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥ १५ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी, समस्त लोकपाल तथा भगवान् महादेव अपने गणोंसहित वहाँ आये ।। १५ ।। ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥ १६ ॥ महाराज! तदनन्तर वायुदेव पाण्डुनन्दन अर्जुनपर सब ओरसे विचित्र सुगन्धित दिव्य मालाओंकी वृष्टि करने लगे ।। १६ ।। जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः
ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः
आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत
नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १९ ॥
नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे—‘अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो। भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥
अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो। कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्
बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव
भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
‘पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं। अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना। अजातशत्रु युधिष्ठिर! (आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें।) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा’ ॥ २२-२३ ॥
वैशम्पायन उवाच
निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम्
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥
तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥
(आजगरपर्व)
(आजगरपर्व)
षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान
जनमेजय उवाच
तस्मिन् कृतास्त्रे रथिनां प्रवीरे
प्रत्यागते भवनाद् वृत्रहन्तुः
अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः
समेत्य शूरेण धनंजयेन ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! रथियोंमें श्रेष्ठ महावीर अर्जुन जब इन्द्रभवनसे दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके लौट आये, तब उनसे मिलकर कुन्तीकुमारोंने पुनः कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः
सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः
तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये
धनेश्वराक्रीडगता विजह्रुः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले— राजन्! वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव इन्द्रतुल्य पराक्रमी अर्जुनके साथ उस परम रमणीय शैलशिखरपर कुबेरकी क्रीड़ाभूमिके अन्तर्गत उन्हीं वनोंमें सुखसे विहार करने लगे ॥ २ ॥
वेश्मानि तान्यप्रतिमानि पश्यन्
क्रीडाश्च नानाद्रुमसंनिबद्धाः
चचार धन्वी बहुधा नरेन्द्रः
सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ॥ ३ ॥
वहाँ कुबेरके अनुपम भवन बने हुए थे। नाना प्रकारके वृक्षोंके निकट अनेक प्रकारके खेल होते रहते थे। उन सबको देखते हुए किरीटधारी अर्जुन बहुधा वहाँ विचरा करते और हाथमें धनुष लेकर सदा अस्त्रोंके अभ्यासमें संलग्न रहते थे ॥ ३ ॥