महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यदृश्यन्त संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः
वे महान् बलवान् तो थे ही, रथके विचित्र पैंतरे बदलकर रणभूमिमें विचर रहे थे। उस युद्धके मैदानमें उनके सौ-सौ और हजार-हजारके झुंड दिखायी देते थे॥ ३६१/२॥
विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः ।। ३७ ।।
विचित्राभरणाश्चैव नन्दयन्तीव मे मनः
उनके मस्तकोंपर विचित्र मुकुट और पगड़ी देखी जाती थी। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र ही थे। वे अद्भुत आभूषणोंसे विभूषित हो मेरे लिये मनोरंजनकी-सी वस्तु बन गये थे॥ ३७१/२॥
अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रचोदितै रणे ।। ३८ ।।
नाशक्नुवं पीडयितुं ते तु मां प्रत्यपीडयन्
उस युद्धमें दिव्यास्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित बाणोंकी वर्षा करके भी मैं उन्हें पीड़ित न कर सका; परंतु वे मुझे बहुत पीड़ा देने लगे॥ ३८१/२॥
तैः पीड्यमानो बहुभिः कृतास्त्रैः कुशलैर्युधि ।। ३९ ।।
व्यथितोऽस्मि महायुद्धे भयं चागान्महन्मम
वे अस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धकुशल थे, उनकी संख्या भी बहुत थी। उस महान् संग्राममें उन दानवोंसे पीड़ित होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया॥ ३९१/२॥
ततोऽहं देवदेवाय रुद्राय प्रयतो रणे ।। ४० ।।
(प्रयतः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने ।)
स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समचोदयम्
तब मैंने एकाग्रचित्त हो मस्तक झुकाकर देवाधिदेव महात्मा रुद्रको प्रणाम किया और ‘समस्त भूतोंका कल्याण हो’ ऐसा कहकर उनके महान् पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया॥ ४०१/२॥
यत् तद् रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् ।। ४१ ।।
(महत् पाशुपतं दिव्यं सर्वलोकनमस्कृतम् ।)
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम्
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् ।। ४२ ।।
उसीको ‘रौद्रास्त्र’ भी कहते हैं। वह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। वह महान् एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय है। उसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ, जिनके तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र तथा छः भुजाएँ थीं। उनका स्वरूप बड़ा तेजस्वी था। उनके मस्तकके बाल सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे॥ ४१-४२॥
लेलिहानैर्महानागैः कृतचीरममित्रहन्