भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1174

ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रनुदितेन च
व्यगृह्णां सह दैत्यैस्तत् पुरं पुरुषर्षभ ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ! फिर दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हुए मैंने दैत्योंसहित उस नगरको क्षत-विक्षत करना आरम्भ किया ॥ २९ ॥
विक्षतं चायसैर्बाणैर्मत्प्रयुक्तैरजिह्मगैः
महीमभ्यपतद् राजन् प्रभग्नं पुरमासुरम् ॥ ३० ॥
राजन्! मेरे चलाये हुए लोहनिर्मित बाण सीधे लक्ष्यतक पहुँचनेवाले थे। उनसे क्षतिग्रस्त हुआ वह दैत्य-नगर तहस-नहस होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३० ॥
ते वध्यमाना मद्बाणैर्वज्रवेगैरयस्मयैः
पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुराः कालचोदिताः ॥ ३१ ॥
महाराज! लोहेके बने हुए मेरे बाणोंका वेग वज्रके समान था। उनकी मार खाकर वे कालप्रेरित असुर चारों ओर चक्कर काटने लगते थे ॥ ३१ ॥
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