भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1187

बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव
भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
‘पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं। अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना। अजातशत्रु युधिष्ठिर! (आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें।) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा’ ॥ २२-२३ ॥

वैशम्पायन उवाच

निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम्
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥
तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥