भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1186

ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः
आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत
नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १९ ॥
नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे—‘अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो। भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥

अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो। कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्