महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! दैत्योंके उस अद्भुत दिखायी देनेवाले नगरको देखकर मैंने मातलिसे पूछा—‘सारथे! यह कौन-सा अद्भुत नगर है?’ ।। ६ ।।
मातलिरुवाच
पुलोमा नाम दैतेयी कालका च महासुरी
दिव्यं वर्षसहस्रं ते चेरतुः परमं तपः ।। ७ ।।
तपसोऽन्ते ततस्ताभ्यां स्वयम्भूरदद् वरम्
अगृह्णीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम् ।। ८ ।।
मातलिने कहा—पार्थ! दैत्यकुलकी कन्या पुलोमा तथा महान् असुरवंशकी कन्या कालका—उन दोनोंने एक हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपस्या पूर्ण होनेपर भगवान् ब्रह्माजीने उन दोनोंको वर दिया। उन्होंने यही वर माँगा कि ‘हमारे पुत्रोंका दुःख दूर हो जाय’ ।। ७-८ ।।
अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगैः
पुरं सुरमणीयं च खचरं सुमहाप्रभम् ।। ९ ।।
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि
महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसैः ।। १० ।।
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम्
ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम् ।। ११ ।।
तदेतत् खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम्
पौलोमाध्युषितं वीर कालकञ्जैश्च दानवैः ।। १२ ।।
राजेन्द्र! उन दोनोंने यह भी प्रार्थना की कि ‘हमारे पुत्र देवता, राक्षस तथा नागोंके लिये भी अवध्य हों। इनके रहनेके लिये एक सुन्दर नगर होना चाहिये, जो अपने महान् प्रभा-पुञ्जसे जगमगा रहा हो। वह नगर विमानकी भाँति आकाशमें विचरनेवाला होना चाहिये, उसमें सब प्रकारके रत्नोंका संचय रहना चाहिये, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर तथा राक्षस कोई भी उसका विध्वंस न कर सके। वह नगर समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न, शोक शून्य तथा रोग आदिसे रहित होना चाहिये।’ भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने कालकेयोंके लिये वैसे ही नगरका निर्माण किया था। यह वही आकाशचारी दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरता है। इसमें देवताओंका प्रवेश नहीं है। वीरवर! इसमें पौलोम और कालकंज नामक दानव ही निवास करते हैं ।। ९—१२ ।।
हिरण्यपुरमित्येवं ख्यायते नगरं महत्
रक्षितं कालकेयैश्च पौलोमैश्च महासुरैः ।। १३ ।।
यह विशाल नगर हिरण्यपुरके नामसे विख्यात है। कालकेय तथा पौलोम नामक महान् असुर इसकी रक्षा करते हैं ।। १३ ।।