महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1172, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत एते मुदिता राजन्नवध्याः सर्वदैवतैः निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः ॥ १४ ॥ राजन्! ये वे ही दानव हैं, जो सम्पूर्ण देवताओंसे अवध्य रहकर उद्वेग तथा उत्कण्ठासे रहित हो यहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं॥ १४॥ मानुषान्मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो ब्रह्मणा पुरा एतानपि रणे पार्थ कालकञ्जान् दुरासदान् वज्रास्त्रेण नयस्वाशु विनाशं सुमहाबलान् ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मनुष्यके हाथसे इनकी मृत्यु निश्चित की थी। कुन्तीकुमार! ये कालकंज और पौलोम अत्यन्त बलवान् तथा दुर्धर्ष हैं। तुम युद्धमें वज्रास्त्रके द्वारा इनका भी शीघ्र ही संहार कर डालो ॥ १५ ॥
अर्जुन उवाच सुरासुरैरवध्यं तदहं ज्ञात्वा विशाम्पते अब्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत् पुरमञ्जसा ॥ १६ ॥ अर्जुन बोले—राजन्! उस हिरण्यपुरको देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य जानकर मैंने मातलिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—'आप यथाशीघ्र इस नगरमें अपना रथ ले चलिये' ॥ १६ ॥ त्रिदशेशद्विषो यावत् क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम् न कथञ्चिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विषः ॥ १७ ॥ 'जिससे देवराजके द्रोहियोंको मैं अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट कर डालूँ। जो देवताओंसे द्वेष रखते हैं, उन पापियोंको मैं किसी प्रकार मारे बिना नहीं छोड़ सकता' ॥ १७ ॥ उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् रथेन तेन दिव्येन हरियुक्तेन मातलिः ॥ १८ ॥ मेरे ऐसा कहनेपर मातलिने घोड़ोंसे युक्त उस दिव्य रथके द्वारा मुझे शीघ्र ही हिरण्यपुरके निकट पहुँचा दिया ॥ १८ ॥ ते मामालक्ष्य दैतेया विचित्राभरणाम्बराः समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय दंशिताः ॥ १९ ॥ मुझे देखते ही विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वे दैत्य कवच पहनकर अपने रथोंपर जा बैठे और बड़े वेगसे मेरे ऊपर टूट पड़े ॥ १९ ॥ ततो नालीकनाराचैर्भल्लैः शक्त्यृष्टितोमरैः प्रत्यघ्नन् दानवेन्द्रा मां क्रुद्धास्तीव्रपराक्रमाः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन प्रचण्ड पराक्रमी दानवेन्द्रोंने नालीक, नाराच, भल्ल, शक्ति, ऋष्टि तथा तोमर आदि अस्त्रोंद्वारा मुझे मारना आरम्भ किया ॥ २० ॥