भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1177

अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभिः ।। ५३ ।।
इन सबके साथ दूसरे भी बहुत-से जीवोंका प्राकट्य हुआ, जिन्होंने नाना प्रकारके रूप धारण कर रखे थे। उन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त-सा हो गया था। पाशुपतास्त्रका प्रयोग होते ही कोई तीन मस्तक, कोई चार दाढ़ें, कोई चार मुख और कोई चार भुजावाले अनेक रूपधारी प्राणी प्रकट हुए, जो मांस, मेदा, वसा और हड्डियोंसे संयुक्त थे ।। ५२-५३ ।।
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा नाशमागताः
अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः ।। ५४ ।।
अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणैः
न्यहनं दानवान् सर्वान् मुहूर्तेनैव भारत ।। ५५ ।।
उन सबके द्वारा गहरी मार पड़नेसे वे सारे दानव नष्ट हो गये। भारत! उस समय सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी तथा वज्र और अशनिके समान प्रकाशित होनेवाले शत्रुविनाशक लोहमय बाणोंद्वारा भी मैंने दो ही घड़ीमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला ।। ५४-५५ ।।
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान् गतासून् नभसश्च्युतान्
दृष्ट्वाहं प्रणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे ।। ५६ ।।
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए अस्त्रोंद्वारा क्षत-विक्षत हो समस्त दानव प्राण त्यागकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। यह देखकर मैंने पुनः त्रिपुरनाशक भगवान् शंकरको प्रणाम किया ।। ५६ ।।
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान् दिव्याभरणभूषितान्
निशम्य परमं हर्षमगमद् देवसारथिः ।। ५७ ।।
दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दानव पाशुपतास्त्रसे पिस गये हैं, यह देखकर देवसारथि मातलिको बड़ा हर्ष हुआ ।। ५७ ।।
तदसह्यं कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम्
दृष्ट्वा मां पूजयामास मातलिः शक्रसारथिः ।। ५८ ।।
जो कार्य देवताओंके लिये भी दुष्कर और असह्य था, वह मेरेद्वारा पूरा हुआ देख इन्द्रसारथि मातलिने मेरा बड़ा सम्मान किया ।। ५८ ।।
उवाच वचनं चेदं प्रीयमाणः कृताञ्जलिः
सुरासुरैरसह्यं हि कर्म यत् साधितं त्वया ।। ५९ ।।
और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर कहा—'अर्जुन! आज तुमने वह कार्य कर दिखाया है जो देवताओं और असुरोंके लिये भी असाध्य था ।। ५९ ।।
न ह्येतत् संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः
(ध्रुवं धनंजय प्रीतस्त्वयि शक्रः पुरार्दन ।)