महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1178, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत् खगं महत् ।। ६० ।।
त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात्
‘साक्षात् देवराज इन्द्र भी युद्धमें यह सब कार्य करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं।
हिरण्यपुरका विनाश करनेवाले वीरवर धनंजय! निश्चय ही देवराज इन्द्र आज तुम्हारे ऊपर
बहुत प्रसन्न होंगे। वीर! तुमने अपने पराक्रम और तपस्याके बलसे इस आकाशचारी विशाल
नगरको तहस-नहस कर डाला, जिसे सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी नष्ट नहीं कर
सकते थे' ।। ६० ।।
विध्वस्ते खपुरे तस्मिन् दानवेषु हतेषु च ।। ६१ ।।
विनदन्त्यः स्त्रियः सर्वा निष्पेतुर्नगराद् बहिः
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुखिताः ।। ६२ ।।
उस आकाशवर्ती नगरका विध्वंस और दानवोंका संहार हो जानेपर वहाँकी सारी
स्त्रियाँ विलाप करती हुई नगरसे बाहर निकल आयीं। उनके केश बिखरे हुए थे। वे दुःख
और व्यथामें डूबी हुई कुररीकी भाँति करुण-क्रन्दन करती थीं ।। ६१-६२ ।।
पेतुः पुत्रान् पितॄन् भ्रातृन् शोचमाना महीतले
रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वराः ।। ६३ ।।
उरांसि परिनिघ्नन्त्यो विस्रस्तस्रग्विभूषणाः
अपने पुत्र, पिता और भाइयोंके लिये शोक करती हुई वे सब-की-सब पृथ्वीपर गिर
पड़ीं। जिनके पति मारे गये थे, वे अनाथ अबलाएँ दीनतापूर्ण कष्टसे रोती-चिल्लाती हुई
छाती पीट रही थीं। उनके हार और आभूषण इधर-उधर गिर पड़े थे ।। ६३ ।।
तच्छोकयुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् ।। ६४ ।।
न बभौ दानवपुरं हतत्त्विट्कं हतेश्वरम्
गन्धर्वनगराकारं हतनागमिव ह्रदम् ।। ६५ ।।
शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत् पुरम्
दानवोंका वह नगर शोकमग्न हो अपनी सारी शोभा खो चुका था। वहाँ दुःख और
दीनता व्याप्त हो रही थी। अपने प्रभुओंके मारे जानेसे वह दानव-नगर निष्प्रभ और
अशोभनीय हो गया था। गन्धर्व-नगरकी भाँति उसका अस्तित्व अयथार्थ जान पड़ता था।
जिसका हाथी मर गया हो, उस सरोवर और जहाँके वृक्ष सूख गये हों, उस वनके समान वह
नगर अदर्शनीय हो गया था ।। ६४-६५ ।।
मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरा नयत् ।। ६६ ।।
देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात्
मेरे मनमें तो हर्ष और उत्साह भरा हुआ था। मैंने देवताओंका कार्य पूरा कर दिया था।
अतः मातलि उस रणभूमिसे मुझे शीघ्र ही देवराज इन्द्रके भवनमें ले आये ।। ६६ ।।
हिरण्यपुरमुत्सृज्य निहत्य च महासुरान् ।। ६७ ।।