भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1179

निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम्

इस प्रकार मैं निवातकवच नामक महादानवोंको (तथा पौलोम और कालकेयोंको)

मारकर तथा उजड़े हुए हिरण्यपुरको उसी अवस्थामें छोड़कर वहाँसे इन्द्रके पास

आया ।। ६७ १/२ ।।

मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् ।। ६८ ।।

सर्वं विश्रावयामास यथाभूतं महाद्युते

महाद्युते! मातलिने मेरा सारा कार्य, जो कुछ जैसे हुआ था, देवराज इन्द्रसे

विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।।

हिरण्यपुरघातं च मायानां च निवारणम् ।। ६९ ।।

निवातकवचानां च वधं संख्ये महौजसाम्

तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सहस्राक्षः पुरंदरः ।। ७० ।।

मरुद्भिः सहितः श्रीमान् साधु साध्वित्यथाब्रवीत्

(परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय सस्मितम् ।)

ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः ।। ७१ ।।

अब्रवीद् विबुधैः सार्धमिदं स मधुरं वचः

अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे ।। ७२ ।।

हिरण्यपुरका विध्वंस, दानवी मायाका निवारण तथा महाबलवान् निवातकवचोंका

युद्धमें वध सुनकर मरुत् आदि देवताओंसहित भगवान् सहस्रलोचन इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो

मुझे साधुवाद देने लगे और मुझे प्रेम पूर्वक हृदयसे लगाकर मुसकराते हुए मेरा मस्तक

सूँघा। तत्पश्चात् देवराजने बार-बार मुझे सान्त्वना देते हुए देवताओंके साथ यह मधुर वचन

कहा—'पार्थ! तुमने युद्धमें वह कार्य किया है, जो देवताओं और असुरोंके लिये भी

असम्भव है ।। ६९–७२ ।।

गुर्वर्थश्च कृतः पार्थ महाशत्रून् घ्नता मम

एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनंजय ।। ७३ ।।

असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम्

अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः ।। ७४ ।।

‘आज तुमने मेरे महान् शत्रुओंका संहार करके गुरुदक्षिणा चुका दी है। धनंजय! इसी

प्रकार तुम्हें सदा युद्धभूमिमें अविचल रहना चाहिये और मोहशून्य होकर अस्त्रोंका प्रयोग

करना चाहिये। देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी युद्धमें तुम्हारा सामना नहीं कर

सकता ।। ७३-७४ ।।

सयक्षासुरगन्धर्वैः सपक्षिगणपन्नगैः

वसुधां चापि कौन्तेय त्वद्बाहुबलनिर्जिताम्

पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ७५ ।।

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