भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । पुष्करेष्ववसः कृष्ण त्वमपो भक्षयन् पुरा ॥ १२ ॥ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें कभी इस धराधाममें अवतीर्ण हो आपने ग्यारह हजार वर्षों-तक केवल जल पीकर रहते हुए पुष्करतीर्थमें निवास किया है ॥ १२ ॥

ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां मधुसूदन । अतिष्ठ एकपादेन वायुभक्षः शतं समाः ॥ १३ ॥ मधुसूदन! आप विशालापुरीके बदरिकाश्रममें दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये केवल वायुका आहार करते हुए सौ वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे हैं ॥ १३ ॥

अवकृष्टोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसंततः । आसीः कृष्ण सरस्वत्यां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ १४ ॥ कृष्ण! आप सरस्वती नदीके तटपर उत्तरीय वस्त्रतकका त्याग करके द्वादशवार्षिक यज्ञ करते समयतक शरीरसे अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। आपके सारे शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं ॥ १४ ॥

प्रभासमप्यथासाद्य तीर्थं पुण्यजनोचितम् । तथा कृष्ण महातेजा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ १५ ॥ अतिष्ठस्त्वमथैकेन पादेन नियमस्थितः । लोकप्रवृत्तिहेतुस्त्वमिति व्यासो ममाब्रवीत् ॥ १६ ॥ गोविन्द! आप पुण्यात्मा पुरुषोंके निवासयोग्य प्रभासतीर्थमें जाकर लोगोंको तपमें प्रवृत्त करनेके लिये शौच-संतोषादि नियमोंमें स्थित हो महातेजस्वी स्वरूपसे एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक एक ही पैरसे खड़े रहे। ये सब बातें मुझसे श्रीव्यासजीने बतायी हैं ॥ १५-१६ ॥

क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव । निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः ॥ १७ ॥ केशव! आप क्षेत्रज्ञ (सबके आत्मा), सम्पूर्ण भूतोंके आदि और अन्त, तपस्याके अधिष्ठान, यज्ञ और सनातन पुरुष हैं ॥ १७ ॥

निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले । प्रथमोत्पतितं कृष्ण मेध्यमश्वमवासृजः ॥ १८ ॥ आप भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर अदितिके दोनों मणिमय कुण्डलोंको ले आये थे; एवं आपने ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होनेवाले यज्ञके उपयुक्त घोड़ेकी रचना की थी ॥ १८ ॥

कृत्वा तत् कर्म लोकानामृषभः सर्वलोकजित् । अवधीस्त्वं रणे सर्वान् समेतान् दैत्यदानवान् ॥ १९ ॥