भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पानेवाले आप लोकेश्वर प्रभुने वह कर्म करके सामना करनेके लिये आये हुए समस्त दैत्यों और दानवोंका युद्धस्थलमें वध किया ॥ १९ ॥ ततः सर्वेश्वरत्वं च सम्प्रदाय शचीपतेः । मानुषेषु महाबाहो प्रादुर्भूतोऽसि केशव ॥ २० ॥ महाबाहु केशव! तदनन्तर शचीपतिको सर्वेश्वर-पद प्रदान करके आप इस समय मनुष्योंमें प्रकट हुए हैं ॥ २० ॥ स त्वं नारायणो भूत्वा हरिरासीः परंतप । ब्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ॥ २१ ॥ वायुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः । अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा त्वं पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥ परंतप! पुरुषोत्तम! आप ही पहले नारायण होकर फिर हरिरूपमें प्रकट हुए। ब्रह्मा, सोम, सूर्य, धर्म, धाता, यम, अनल, वायु, कुबेर, रुद्र, काल, आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, चराचरगुरु तथा सृष्टिकर्ता एवं अजन्मा आप ही हैं ॥ २१-२२ ॥ परायणं देवमूर्धा क्रतुभिर्मधुसूदन । अयजो भूरितेजा वै कृष्ण चैत्ररथे वने ॥ २३ ॥ मधुसूदन श्रीकृष्ण! आपने चैत्ररथवनमें अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। आप सबके उत्तम आश्रय, देवशिरोमणि और महातेजस्वी हैं ॥ २३ ॥ शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन । एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि भागशः ॥ २४ ॥ जनार्दन! उस समय आपने प्रत्येक यज्ञमें पृथक्-पृथक् एक-एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें दीं ॥ २४ ॥ अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन । त्वं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो विभुः ॥ २५ ॥ यदुनन्दन! आप अदितिके पुत्र हो, इन्द्रके छोटे भाई होकर सर्वव्यापी विष्णुके नामसे विख्यात हैं ॥ २५ ॥ शिशुर्भूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परंतप । त्रिभिर्विक्रमणैः कृष्ण क्रान्तवानसि तेजसा ॥ २६ ॥ परंतप श्रीकृष्ण! आपने वामनावतारके समय छोटे-से बालक होकर भी अपने तेजसे तीन डगोंद्वारा द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूलोक—तीनोंको नाप लिया ॥ २६ ॥ सम्प्राप्य दिवमाकाशमादित्यस्यन्दने स्थितः । अत्यरोचश्च भूतात्मन् भास्करं स्वेन तेजसा ॥ २७ ॥ भूतात्मन्! आपने सूर्यके रथपर स्थित हो द्युलोक और आकाशमें व्याप्त होकर अपने तेजसे भगवान् भास्करको भी अत्यन्त प्रकाशित किया है ॥ २७ ॥