महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रादुर्भावसहस्रेषु तेषु तेषु त्वया विभो । अधर्मरुचयः कृष्ण निहताः शतशोऽसुराः ॥ २८ ॥ विभो! आपने सहस्रों अवतार धारण किये हैं और उन अवतारोंमें सैकड़ों असुरोंका, जो अधर्ममें रुचि रखनेवाले थे, वध किया है ॥ २८ ॥ सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ । कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २९ ॥ आपने मुर दैत्यके लोहमय पाश काट दिये, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला और पुनः प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सकुशल यात्रा करनेयोग्य बना दिया ॥ २९ ॥ जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालो जनैः सह । जरासंधश्च शैब्यश्च शतधन्वा च निर्जितः ॥ ३० ॥ भगवन्! आपने जारूथी नगरीमें आहुति, क्राथ, साथियोंसहित शिशुपाल, जरासंध, शैब्य और शतधन्वाको परास्त किया ॥ ३० ॥ तथा पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । अवाप्सीर्महिषीं भोज्यां रणे निर्जित्य रुक्मिणम् ॥ ३१ ॥ इसी प्रकार मेघके समान घर्घर शब्द करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा कुण्डिनपुरमें जाकर आपने रुक्मीको युद्धमें जीता और भोजवंशकी कन्या रुक्मिणीको अपनी पटरानीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ३१ ॥ इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कसेरुमान् । हतः सौभपतिः शाल्वस्त्वया सौभं च पातितम् ॥ ३२ ॥ प्रभो! आपने क्रोधसे इन्द्रद्युम्नको मारा और यवनजातीय कसेरुमान् एवं सौभपति शाल्वको भी यमलोक पहुँचा दिया। साथ ही शाल्वके सौभ विमानको भी छिन्न-भिन्न करके धरतीपर गिरा दिया ॥ ३२ ॥ एवमेते युधि हता भूयश्चान्याञ्छृणुष्व ह । इरावत्यां हतो भोजः कार्तवीर्यसमो युधि ॥ ३३ ॥ इस प्रकार इन पूर्वोक्त राजाओंको आपने युद्धमें मारा है। अब आपके द्वारा मारे हुए औरोंके भी नाम सुनिये। इरावतीके तटपर आपने कार्तवीर्य अर्जुनके सदृश पराक्रमी भोजको युद्धमें मार गिराया ॥ ३३ ॥ गोपतिस्तालकेतुश्च त्वया विनिहितावभौ । तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन ॥ ३४ ॥ द्वारकामात्मसात् कृत्वा समुद्रं गमयिष्यसि । गोपति और तालकेतु—ये दोनों भी आपके ही हाथसे मारे गये। जनार्दन! भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न तथा ऋषि-मुनियोंकी प्रिय अपने अधीन की हुई पुण्यमयी द्वारका नगरीको आप अन्तमें समुद्रमें विलीन कर देंगे ॥ ३४ ½ ॥