भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन । त्वयि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ॥ ३५ ॥ आसीनं चैत्यमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा । आगम्य ऋषयः सर्वेऽयाचन्ताभयमच्युत ॥ ३६ ॥ मधुसूदन! वास्तवमें आपमें न तो क्रोध है, न मात्सर्य है, न असत्य है, न निर्दयता ही है। दाशार्ह! फिर आपमें कठोरता तो हो ही कैसे सकती है? अच्युत! महलके मध्यभागमें बैठे और अपने तेजसे उद्भासित हुए आपके पास आकर सम्पूर्ण ऋषियोंने अभयकी याचना की ॥ ३५-३६ ॥

युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन । आत्मनैवात्मसात् कृत्वा जगदासीः परंतप ॥ ३७ ॥ परंतप मधुसूदन! प्रलयकालमें समस्त भूतोंका संहार करके इस जगत्‌को स्वयं ही अपने भीतर रखकर आप अकेले ही रहते हैं ॥ ३७ ॥

युगादौ तव वार्ष्णेय नाभिपद्मादजायत । ब्रह्मा चराचरगुरुर्यस्येदं सकलं जगत् ॥ ३८ ॥ वार्ष्णेय! सृष्टिके प्रारम्भकालमें आपके नाभि-कमलसे चराचरगुरु ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् है ॥ ३८ ॥

तं हन्तुमुद्यतौ घोरौ दानवौ मधुकैटभौ । तयोर्व्यतिक्रमं दृष्ट्वा क्रुद्धस्य भवतो हरेः ॥ ३९ ॥ ललाटाज्जातवाञ्छम्भुः शूलपाणिस्त्रिलोचनः । इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ ॥ ४० ॥ जब ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, उस समय दो भयंकर दानव मधु और कैटभ उनके प्राण लेनेको उद्यत हो गये। उनका यह अत्याचार देखकर क्रोधमें भरे हुए आप श्रीहरिके ललाटसे भगवान् शंकरका प्रादुर्भाव हुआ, जिनके हाथोंमें त्रिशूल शोभा पा रहा था। उनके तीन नेत्र थे। इस प्रकार वे दोनों देव ब्रह्मा और शिव आपके ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९-४० ॥

त्वन्नियोगकरावेताविति मे नारदोऽब्रवीत् । तथा नारायण पुरा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ ४१ ॥ इष्टवांस्त्वं महासत्रं कृष्ण चैत्ररथे वने । नैवं परे नापरे वा करिष्यन्ति कृतानि वा ॥ ४२ ॥ यानि कर्माणि देव त्वं बाल एव महाबलः । कृतवान् पुण्डरीकाक्ष बलदेवसहायवान् । कैलासभवने चापि ब्राह्मणैरन्वसः सह ॥ ४३ ॥ वे दोनों आपकी ही आज्ञाका पालन करनेवाले हैं, यह बात मुझे नारदजीने बतलायी थी। नारायण श्रीकृष्ण! इसी प्रकार पूर्वकालमें चैत्ररथवनके भीतर आपने प्रचुर