महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1203, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस ददर्श महाकायं भुजङ्गं लोमहर्षणम् गिरिदुर्गे समापन्नं कायेनावृत्य कन्दरम् ॥ २४ ॥ तदनन्तर एक दिनकी बात है, भीमसेनके सिंहनादसे भयभीत हो गुफाओंमें रहनेवाले सारे सर्प बड़े वेगसे भागने लगे और भीमसेन धीरे-धीरे उन्हींका पीछा करने लगे। श्रेष्ठ देवताओंके समान कान्तिमान् महाबली भीमसेनने आगे जाकर एक विशालकाय अजगर देखा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। वह अपने शरीरसे एक (विशाल) कन्दराको घेरकर पर्वतके एक दुर्गम स्थानमें रहता था ॥ २२—२४ ॥ पर्वताभोगवर्ष्माणमतिकायं महाबलम् चित्राङ्गमङ्गैश्चित्रैर्हरिद्रासदृशच्छविम् ॥ २५ ॥ गुहाकारेण वक्त्रेण चतुर्दंष्ट्रेण राजता दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिह्हानं सृक्किणी मुहुः ॥ २६ ॥ त्रासनं सर्वभूतानां कालान्तकयमोपमम् निःश्वासक्ष्वेडनादेन भर्त्सयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥ उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह महाकाय होनेके साथ ही अत्यन्त बलवान् भी था। उसका प्रत्येक अंग शारीरिक विचित्र चिह्नोंसे चिह्नित होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था। उसका रंग हल्दीके समान पीला था। प्रकाशमान चारों दाढ़ोंसे युक्त उसका मुख गुफा-सा जान पड़ता था। उसकी आँखें अत्यन्त लाल और आग उगलती-सी प्रतीत होती थीं। वह बार-बार अपने दोनों गलफरोंको चाट रहा था। कालान्तक तथा यमके समान समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह भयानक भुजंग अपने उच्छ्वास और सिंहनादसे दूसरोंकी भर्त्सना करता-सा प्रतीत होता था ॥ २५—२७ ॥ स भीमं सहसाभ्येत्य पृदाकुः कुपितो भृशम् जग्राहाजगरो ग्राहो भुजयोरुभयोर्बलात् ॥ २८ ॥ वह अजगर अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ था। (मनुष्योंको) जकड़नेवाले उस सर्पने सहसा भीमसेनके निकट पहुँचकर उनकी दोनों बाँहोंको बलपूर्वक जकड़ लिया ॥ २८ ॥