भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1204

तेन संस्पृष्टगात्रस्य भीमसेनस्य वै तदा संज्ञा मुमोह सहसा वरदानेन तस्य हि ॥ २९ ॥ उस समय भीमसेनके शरीरका उससे स्पर्श होते ही वे भीमसेन सहसा अचेत हो गये। ऐसा इसलिये हुआ कि उस सर्पको वैसा ही वरदान मिला था ॥ २९ ॥

दशनागसहस्राणि धारयन्ति हि यद् बलम् तद् बलं भीमसेनस्य भुजयोरसमं परैः ॥ ३० ॥ दस हजार गजराज जितना बल धारण करते हैं, उतना ही बल भीमसेनकी भुजाओंमें विद्यमान था। उनके बलकी और कहीं समता नहीं थी ॥ ३० ॥

स तेजस्वी तथा तेन भुजगेन वशीकृतः विस्फुरन् शनकैर्भीमो न शशाक विचेष्टितुम् ॥ ३१ ॥ ऐसे तेजस्वी भीम भी उस अजगरके वशमें पड़ गये। वे धीरे-धीरे छटपटाते रहे, परंतु छूटनेकी अधिक चेष्टा करनेमें सफल न हो सके ॥ ३१ ॥

नागायुतसमप्राणः सिंहस्कन्धो महाभुजः गृहीतो व्यजहात् सत्त्वं वरदानविमोहितः ॥ ३२ ॥ उनकी प्राणशक्ति दस सहस्र हाथियोंके समान थी। दोनों कंधे सिंहके कंधोंके समान थे और भुजाएँ बहुत बड़ी थीं। फिर भी सर्पको मिले हुए वरदानके प्रभावसे मोहित हो जानेके कारण सर्पकी पकड़में आकर वे अपना साहस खो बैठे ॥ ३२ ॥