भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1208, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1208

अहमद्योपयोक्ष्यामि विधानं पश्य यादृशम् ।। १५ ।।
‘तुम यद्यपि अवध्य हो; क्योंकि मेरे ही वंशज हो। देखनेमें अत्यन्त प्रिय लगते हो तथापि आज तुम्हें अपना आहार बनाऊँगा। देखो, विधाताका कैसा विधान है? ।। १५ ।।

न हि मे मुच्यते कश्चित् कथंचित् प्रग्रहं गतः
गजो वा महिषो वापि षष्ठे काले नरोत्तम ।। १६ ।।
‘नरश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें कोई भैंसा अथवा हाथी ही क्यों न हो, मेरी पकड़में आ जानेपर किसी तरह छूट नहीं सकता ।। १६ ।।

नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता
गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ।। १७ ।।
‘कौरवश्रेष्ठ! तुम तिर्यग् योनिमें पड़े हुए किसी साधारण सर्पकी पकड़में नहीं आये हो। किंतु मुझे ऐसा ही वरदान मिला है (इसीलिये मैं तुम्हें पकड़ सका हूँ) ।।

पतता हि विमानाग्र्यान्मया शक्रासनाद् द्रुतम्
कुरु शापान्तमित्युक्तो भगवान् मुनिसत्तमः ।। १८ ।।
‘जब मैं इन्द्रके सिंहासनसे भ्रष्ट हो शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ठ विमानसे नीचे गिरने लगा, उस समय मैंने मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्यसे प्रार्थना की कि प्रभो! मेरे शापका अन्त नियत कर दीजिये ।। १८ ।।

स मामुवाच तेजस्वी कृपयाभिपरिप्लुतः
मोक्षस्ते भविता राजन् कस्माच्चित् कालपर्ययात् ।। १९ ।।
‘उस समय उन तेजस्वी महर्षिने दयासे द्रवित होकर मुझसे कहा—‘राजन्! कुछ कालके पश्चात् तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे’ ।। १९ ।।

ततोऽस्मि पतितो भूमौ न च मामजहात् स्मृतिः
स्मार्तमस्ति पुराणं मे यथैवाधिगतं तथा ।। २० ।।
‘उनके इतना कहते ही मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु आज भी वह पुरानी स्मरण-शक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। यद्यपि यह वृत्तान्त बहुत पुराना हो चुका है तथापि जो कुछ जैसे हुआ था; वह सब मुझे ज्यों-का-त्यों स्मरण है ।। २० ।।

यस्तु ते व्याहृतान् प्रश्नान् प्रतिब्रूयाद् विभागवित्।
स त्वां मोक्षयिता शापादिति मामब्रवीदृषिः ।। २१ ।।
‘महर्षिने मुझसे कहा था कि ‘जो तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नोंका विभागपूर्वक उत्तर दे दे, वही तुम्हें शापसे छुड़ा सकता है ।। २१ ।।

गृहीतस्य त्वया राजन् प्राणिनोऽपि बलीयसः
सत्त्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ।। २२ ।।
‘राजन्! जिसे तुम पकड़ लोगे, वह बलवान्-से-बलवान् प्राणी क्यों न हो, उसका भी धैर्य छूट जायगा। एवं तुमसे अधिक शक्तिशाली पुरुष क्यों न हो, सबका साहस शीघ्र ही

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