महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1207, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
इत्येवंवादिनं वीर भीममक्लिष्टकारिणम् भोगेन महता गृह्य समन्तात् पर्यवेष्टयत् ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसी बातें करनेवाले वीरवर भीमसेनको, जो अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले थे, उस अजगरने अपने विशाल शरीरसे जकड़कर चारों ओरसे लपेट लिया ॥ ८ ॥
निगृह्यैनं महाबाहुं ततः स भुजगस्तदा विमुच्यास्य भुजौ पीनाविदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥ तब इस प्रकार महाबाहु भीमसेनको अपने वशमें करके उस भुजंगमने उनकी दोनों मोटी-मोटी भुजाओंको छोड़ दिया और इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
दिष्टस्त्वं क्षुधितस्याद्य दैवैर्भक्षो महाभुज दिष्ट्या कालस्य महतः प्रियाः प्राणा हि देहिनाम् ॥ १० ॥ 'महाबाहो! मैं दीर्घकालसे भूखा बैठा था, आज सौभाग्यवश देवताओंने तुम्हें ही मेरे लिये भोजनके रूपमें भेज दिया है। सभी देहधारियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय होते हैं ॥ १० ॥
यथा त्विदं मया प्राप्तं सर्परूपमरिंदम तथावश्यं मया ख्याप्यं तवाद्य शृणु सत्तम ॥ ११ ॥ 'शत्रुदमन! जिस प्रकार मुझे यह सर्पका शरीर प्राप्त हुआ है, वह आज अवश्य तुमसे बतलाना है। सज्जनशिरोमणे! तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ११ ॥
इमामवस्थां सम्प्राप्तो ह्यहं कोपान्मनीषिणाम् शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्वं तत् कथयामि ते ॥ १२ ॥ 'मैं मनीषी महात्माओंके कोपसे इस दुर्दशाको प्राप्त हुआ हूँ और इस शापके निवारणकी प्रतीक्षा करते हुए यहाँ रहता हूँ। शापका क्या कारण है? यह सब तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥
नहुषो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः तवैव पूर्वः पूर्वेषामायोर्वंशधरः सुतः ॥ १३ ॥ 'मैं राजर्षि नहुष हूँ, अवश्य ही यह मेरा नाम तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा। मैं तुम्हारे पूर्वजोंका भी पूर्वज हूँ। महाराज आयुका वंशप्रवर्तक पुत्र हूँ ॥ १३ ॥
सोऽहं शापादगस्त्यस्य ब्राह्मणानवमन्य च इमामवस्थामापन्नः पश्य दैवमिदं मम ॥ १४ ॥ 'मैं ब्राह्मणोंका अनादर करके महर्षि अगस्त्यके शापसे इस अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। मेरे इस दुर्भाग्यको अपने आँखों देख लो ॥ १४ ॥
त्वां चेदवध्यं दायादमतीव प्रियदर्शनम्