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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

वैशम्पायन उवाच

इत्येवंवादिनं वीर भीममक्लिष्टकारिणम् भोगेन महता गृह्य समन्तात् पर्यवेष्टयत् ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसी बातें करनेवाले वीरवर भीमसेनको, जो अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले थे, उस अजगरने अपने विशाल शरीरसे जकड़कर चारों ओरसे लपेट लिया ॥ ८ ॥

निगृह्यैनं महाबाहुं ततः स भुजगस्तदा विमुच्यास्य भुजौ पीनाविदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥ तब इस प्रकार महाबाहु भीमसेनको अपने वशमें करके उस भुजंगमने उनकी दोनों मोटी-मोटी भुजाओंको छोड़ दिया और इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

दिष्टस्त्वं क्षुधितस्याद्य दैवैर्भक्षो महाभुज दिष्ट्या कालस्य महतः प्रियाः प्राणा हि देहिनाम् ॥ १० ॥ 'महाबाहो! मैं दीर्घकालसे भूखा बैठा था, आज सौभाग्यवश देवताओंने तुम्हें ही मेरे लिये भोजनके रूपमें भेज दिया है। सभी देहधारियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय होते हैं ॥ १० ॥

यथा त्विदं मया प्राप्तं सर्परूपमरिंदम तथावश्यं मया ख्याप्यं तवाद्य शृणु सत्तम ॥ ११ ॥ 'शत्रुदमन! जिस प्रकार मुझे यह सर्पका शरीर प्राप्त हुआ है, वह आज अवश्य तुमसे बतलाना है। सज्जनशिरोमणे! तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ११ ॥

इमामवस्थां सम्प्राप्तो ह्यहं कोपान्मनीषिणाम् शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्वं तत् कथयामि ते ॥ १२ ॥ 'मैं मनीषी महात्माओंके कोपसे इस दुर्दशाको प्राप्त हुआ हूँ और इस शापके निवारणकी प्रतीक्षा करते हुए यहाँ रहता हूँ। शापका क्या कारण है? यह सब तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥

नहुषो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः तवैव पूर्वः पूर्वेषामायोर्वंशधरः सुतः ॥ १३ ॥ 'मैं राजर्षि नहुष हूँ, अवश्य ही यह मेरा नाम तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा। मैं तुम्हारे पूर्वजोंका भी पूर्वज हूँ। महाराज आयुका वंशप्रवर्तक पुत्र हूँ ॥ १३ ॥

सोऽहं शापादगस्त्यस्य ब्राह्मणानवमन्य च इमामवस्थामापन्नः पश्य दैवमिदं मम ॥ १४ ॥ 'मैं ब्राह्मणोंका अनादर करके महर्षि अगस्त्यके शापसे इस अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। मेरे इस दुर्भाग्यको अपने आँखों देख लो ॥ १४ ॥

त्वां चेदवध्यं दायादमतीव प्रियदर्शनम्

अहमद्योपयोक्ष्यामि विधानं पश्य यादृशम् ।। १५ ।।
‘तुम यद्यपि अवध्य हो; क्योंकि मेरे ही वंशज हो। देखनेमें अत्यन्त प्रिय लगते हो तथापि आज तुम्हें अपना आहार बनाऊँगा। देखो, विधाताका कैसा विधान है? ।। १५ ।।

न हि मे मुच्यते कश्चित् कथंचित् प्रग्रहं गतः
गजो वा महिषो वापि षष्ठे काले नरोत्तम ।। १६ ।।
‘नरश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें कोई भैंसा अथवा हाथी ही क्यों न हो, मेरी पकड़में आ जानेपर किसी तरह छूट नहीं सकता ।। १६ ।।

नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता
गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ।। १७ ।।
‘कौरवश्रेष्ठ! तुम तिर्यग् योनिमें पड़े हुए किसी साधारण सर्पकी पकड़में नहीं आये हो। किंतु मुझे ऐसा ही वरदान मिला है (इसीलिये मैं तुम्हें पकड़ सका हूँ) ।।

पतता हि विमानाग्र्यान्मया शक्रासनाद् द्रुतम्
कुरु शापान्तमित्युक्तो भगवान् मुनिसत्तमः ।। १८ ।।
‘जब मैं इन्द्रके सिंहासनसे भ्रष्ट हो शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ठ विमानसे नीचे गिरने लगा, उस समय मैंने मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्यसे प्रार्थना की कि प्रभो! मेरे शापका अन्त नियत कर दीजिये ।। १८ ।।

स मामुवाच तेजस्वी कृपयाभिपरिप्लुतः
मोक्षस्ते भविता राजन् कस्माच्चित् कालपर्ययात् ।। १९ ।।
‘उस समय उन तेजस्वी महर्षिने दयासे द्रवित होकर मुझसे कहा—‘राजन्! कुछ कालके पश्चात् तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे’ ।। १९ ।।

ततोऽस्मि पतितो भूमौ न च मामजहात् स्मृतिः
स्मार्तमस्ति पुराणं मे यथैवाधिगतं तथा ।। २० ।।
‘उनके इतना कहते ही मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु आज भी वह पुरानी स्मरण-शक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। यद्यपि यह वृत्तान्त बहुत पुराना हो चुका है तथापि जो कुछ जैसे हुआ था; वह सब मुझे ज्यों-का-त्यों स्मरण है ।। २० ।।

यस्तु ते व्याहृतान् प्रश्नान् प्रतिब्रूयाद् विभागवित्।
स त्वां मोक्षयिता शापादिति मामब्रवीदृषिः ।। २१ ।।
‘महर्षिने मुझसे कहा था कि ‘जो तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नोंका विभागपूर्वक उत्तर दे दे, वही तुम्हें शापसे छुड़ा सकता है ।। २१ ।।

गृहीतस्य त्वया राजन् प्राणिनोऽपि बलीयसः
सत्त्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ।। २२ ।।
‘राजन्! जिसे तुम पकड़ लोगे, वह बलवान्-से-बलवान् प्राणी क्यों न हो, उसका भी धैर्य छूट जायगा। एवं तुमसे अधिक शक्तिशाली पुरुष क्यों न हो, सबका साहस शीघ्र ही

खो जायगा' ।। २२ ।। इति चाप्यहमश्रौषं वचस्तेषां दयावताम् मयि संजातहार्दानाम् अथ तेऽन्तर्हिता द्विजाः ।। २३ ।। इस प्रकार मेरे प्रति हार्दिक दयाभाव उत्पन्न हो जानेके कारण उन दयालु महर्षियोंने जो बात कही थी, वह भी मैंने स्पष्ट सुनी। तत्पश्चात् वे सारे ब्रह्मर्षि अन्तर्धान हो गये ।। २३ ।। सोऽहं परमदुष्कर्मा वसामि निरयेऽशुचौ सर्पयोनिमिमां प्राप्य कालाकाङ्क्षी महाद्युते ।। २४ ।। महाद्युते! इस प्रकार मैं अत्यन्त दुष्कर्मी होनेके कारण इस अपवित्र नरकमें निवास करता हूँ। इस सर्पयोनिमें पड़कर इससे छूटनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हूँ' ।। २४ ।। तमुवाच महाबाहुर्भीमसेनो भुजङ्गमम् न च कुप्ये महासर्प न चात्मानं विगर्हये ।। २५ ।। तब महाबाहु भीमने उस अजगरसे कहा—'महासर्प! न तो मैं आपपर क्रोध करता हूँ और न अपनी ही निन्दा करता हूँ ।। २५ ।। यस्मादभावी भावी वा मनुष्यः सुखदुःखयोः आगमे यदि वापाये न तत्र ग्लपयेन्मनः ।। २६ ।। 'क्योंकि मनुष्य सुख-दुःखकी प्राप्ति अथवा निवृत्तिमें कभी असमर्थ होता है और कभी समर्थ। अतः किसी भी दशामें अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये ।। २६ ।। दैवं पुरुषकारेण को वञ्चयितुमर्हति दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थकः ।। २७ ।। 'कौन ऐसा मनुष्य है, जो पुरुषार्थके बलसे दैवको वंचित कर सके। मैं तो दैवको ही बड़ा मानता हूँ, पुरुषार्थ व्यर्थ है ।। २७ ।। पश्य दैवोपघाताद्धि भुजवीर्यव्यपाश्रयम् इमामवस्थां सम्प्राप्तमनिमित्तमिहाद्य माम् ।। २८ ।। 'देखिये, दैवके आघातसे आज मैं अकारण ही यहाँ इस दशाको प्राप्त हो गया हूँ। नहीं तो मुझे अपने बाहुबलका बड़ा भरोसा था ।। २८ ।। किंतु नाद्यानुशोचामि तथाऽऽत्मानं विनाशितम् यथा तु विपिने न्यस्तान् भ्रातॄन् राज्यपरिच्युतान् ।। २९ ।। 'परंतु आज मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करता हूँ, जितना कि राज्यसे वंचित हो वनमें पड़े हुए अपने भाइयोंके लिये मुझे शोक हो रहा है ।। २९ ।। हिमवांश्च सुदुर्गेाऽयं यक्षराक्षससंकुलः मां समुद्वीक्षमाणास्ते प्रपतिष्यन्ति विह्वलाः ।। ३० ।।

'यक्षों तथा राक्षसोंसे भरा हुआ यह हिमालय अत्यन्त दुर्गम है, मेरे भाई व्याकुल होकर जब मुझे खोजेंगे, तब अवश्य कहीं खंदकमें गिर पड़ेंगे॥ ३०॥ विनष्टमथ मां श्रुत्व भविष्यन्ति निरुद्यमाः धर्मशीला मया ते हि बाध्यन्ते राज्यगृद्धिना ॥ ३१ ॥ 'मेरी मृत्यु हुई सुनकर वे राज्य-प्राप्तिका सारा उद्योग छोड़ बैठेंगे। मेरे सभी भाई स्वभावतः धर्मात्मा हैं। मैं ही राज्यके लोभसे उन्हें युद्धके लिये बाध्य करता रहता हूँ॥ ३१ ॥' अथवा नार्जुनो धीमान् विषादमुपयास्यति सर्वास्त्रविदनाधृष्यो देवगन्धर्वराक्षसैः ॥ ३२ ॥ 'अथवा बुद्धिमान् अर्जुन विषादमें नहीं पड़ेंगे; क्योंकि वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता हैं। देवता, गन्धर्व तथा राक्षस भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते ॥ ३२ ॥' समर्थः स महाबाहुरेकोऽपि सुमहाबलः देवराजमपि स्थानात् प्रच्यावयितुमज्जसा ॥ ३३ ॥ 'महाबली महाबाहु अर्जुन अकेले ही देवराज इन्द्रको भी अनायास ही अपने स्थानसे हटा देनेमें समर्थ हैं॥ ३३ ॥' किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्धूतदेविनम् विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भमोहपरायणम् ॥ ३४ ॥ 'फिर उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है, जो कपटद्यूतका सेवन करनेवाला, लोकद्रोही, दम्भी तथा मोहमें डूबा हुआ है॥' मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् यास्माकं नित्यमाशास्ते महत्त्वमधिकं परैः ॥ ३५ ॥ 'मैं पुत्रोंके प्रति स्नेह रखनेवाली अपनी उस दीन माताके लिये शोक करता हूँ, जो सदा यह आशा रखती है कि हम सभी भाइयोंका महत्त्व शत्रुओंसे बढ़-चढ़कर हो॥ ३५ ॥' तस्याः कथं त्वनाथाया मद्दिनाशाद् भुजङ्गम सफलास्ते भविष्यन्ति मयि सर्वे मनोरथाः ॥ ३६ ॥ 'भुजंगम! मेरे मरनेसे मेरी अनाथ माताके वे सभी मनोरथ जो मुझपर अवलम्बित थे, कैसे सफल हो सकेंगे? ॥ ३६ ॥' नकुलः सहदेवश्च यमौ च गुरुवर्तिनौ मद्बाहुबलसंगुप्तौ नित्यं पुरुषमानिनौ ॥ ३७ ॥ 'एक साथ जन्म लेनेवाले नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहते हैं। मेरे बाहुबलसे सुरक्षित हो वे दोनों भाई सर्वदा अपने पौरुषपर अभिमान रखते हैं॥ ३७ ॥' भविष्यतो निरुत्साहौ भ्रष्टवीर्यपराक्रमौ

मद्दिनाशात् परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः ॥ ३८ ॥ 'वे मेरे विनाशसे उत्साहशून्य हो जायँगे, अपने बल और पराक्रम खो बैठेंगे और सर्वथा शक्तिहीन हो जायँगे, ऐसा मेरा विश्वास है' ॥ ३८ ॥ एवंविधं बहु तदा विललाप वृकोदरः भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम् ॥ ३९ ॥ जनमेजय! उस समय भीमसेनने इस तरहकी बहुत-सी बातें कहकर देरतक विलाप किया। वे सर्पके शरीरसे इस प्रकार जकड़ गये थे कि हिल-डुल भी नहीं सकते थे ॥ ३९ ॥ युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो बभूवास्वस्थचेतनः । अनिष्टदर्शनान् घोरानुत्पातान् परिचिन्तयन् ॥ ४० ॥ उधर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अनिष्टसूचक भयंकर उत्पातोंको देखकर बड़ी चिन्तामें पड़े। वे व्याकुल हो गये ॥ ४० ॥ दारुणं ह्यशिवं नादं शिवा दक्षिणतः स्थिता । दीप्तायां दिशि वित्रस्ता रौति तस्याश्रमस्य ह ॥ ४१ ॥ उनके आश्रमसे दक्षिण दिशामें, जहाँ आग लगी हुई थी, एक डरी हुई सियारिन खड़ी हो दारुण अमंगलसूचक आर्तनाद करने लगी ॥ ४१ ॥ एकपक्षाक्षिचरणा वर्तिका घोरदर्शना । रक्तं वमन्ती ददृशे प्रत्यादित्यमभासुरा ॥ ४२ ॥ एक पाँख, एक आँख तथा एक पैरवाली भयंकर और मलिन वर्तिका (बटेर चिड़िया) सूर्यकी ओर रक्त उगलती हुई दिखायी दी ॥ ४२ ॥ प्रववौ चानिलो रूक्षश्चण्डः शर्करकर्षणः । अपसव्यानि सर्वाणि मृगपक्षिरुतानि च ॥ ४३ ॥ उस समय कंकड़ बरसानेवाली रूखी और प्रचण्ड वायु बह रही थी और पशु-पक्षियोंके सम्पूर्ण शब्द दाहिनी ओर हो रहे थे ॥ ४३ ॥ पृष्ठतो वायसः कृष्णो याहि याहीति शंसति । मुहुर्मुहुः स्फुरति च दक्षिणोऽस्य भुजस्तथा ॥ ४४ ॥ पीछेकी ओरसे काला कौवा 'जाओ-जाओ' की रट लगा रहा था और उनकी दाहिनी बाँह बार-बार फड़क उठती थी ॥ ४४ ॥ हृदयं चरणश्चापि वामोऽस्य परितप्यति । सव्यस्याक्ष्णो विकारश्चाप्यनिष्टः समपद्यत ॥ ४५ ॥ उनके हृदय तथा बायें पैरमें पीड़ा होने लगी। बायीं आँखमें अनिष्टसूचक विकार उत्पन्न हो गया ॥ ४५ ॥ धर्मराजोऽपि मेधावी मन्यमानो महत् भयम् । द्रौपदीं परिपप्रच्छ क्व भीम इति भारत ॥ ४६ ॥

भारत! परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने भी अपने मनमें महान् भय मानते हुए द्रौपदीसे पूछा—‘भीमसेन कहाँ है?’ ॥ ४६ ॥
शशंस तस्मै पाञ्चाली चिरयातं वृकोदरम्।
स प्रतस्थे महाबाहुर्धौम्येन सहितो नृपः ॥ ४७ ॥
द्रौपदीने उत्तर दिया—‘उनको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी’—यह सुनकर महाबाहु महाराज युधिष्ठिर महर्षि धौम्यके साथ उनकी खोजके लिये चल दिये ॥ ४७ ॥
द्रौपद्या रक्षणं कार्यमित्युवाच धनंजयम्।
नकुलं सहदेवं च व्यादिदेश द्विजान् प्रति ॥ ४८ ॥
जाते समय उन्होंने अर्जुनसे कहा—‘द्रौपदीकी रक्षा करना।’ फिर उन्होंने नकुल और सहदेवको ब्राह्मणोंकी रक्षा एवं सेवाके लिये आज्ञा दी ॥ ४८ ॥
स तस्य पदमुन्नीय तस्मादेवाश्रमात् प्रभुः।
मृगयामास कौन्तेयो भीमसेनं महावने ॥ ४९ ॥
शक्तिशाली कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने उस महान् वनमें भीमसेनके पदचिह्न देखते हुए उस आश्रमसे निकलकर सब ओर खोजा ॥ ४९ ॥
स प्राचीं दिशमास्थाय महतो गजयूथपान्।
ददर्श पृथिवीं चिह्नैर्भीमस्य परिचिह्निताम् ॥ ५० ॥
पहले पूर्व दिशामें जाकर हाथियोंके बड़े-बड़े यूथपतियोंको देखा। वहाँकी भूमि भीमसेनके पद-चिह्नोंसे चिह्नित थी ॥ ५० ॥
ततो मृगसहस्राणि मृगेन्द्राणां शतानि च।
पतितानि वने दृष्ट्वा मार्गं तस्याविशन्नृपः ॥ ५१ ॥
वहाँसे आगे बढ़नेपर उन्होंने वनमें सैकड़ों सिंह और हजारों अन्य हिंसक पशु पृथ्वीपर पड़े देखे। देखकर भीमसेनके मार्गका अनुसरण करते हुए राजाने उसी वनमें प्रवेश किया ॥ ५१ ॥
धावतस्तस्य वीरस्य मृगार्थं वातरंहसः।
ऊरुवातविनिर्भग्ना द्रुमा व्यावार्जिताः पथि ॥ ५२ ॥
वायुके समान वेगशाली वीरवर भीमसेनके शिकारके लिये दौड़नेपर मार्गमें उनकी जाँघोंके आघातसे टूटकर पड़े हुए बहुत-से वृक्ष दिखायी दिये ॥ ५२ ॥
स गत्वा तैस्तदा चिह्नैर्ददर्श गिरिगह्वरे।
रूक्षमारुतभूयिष्ठे निष्पत्रद्रुमसंकुले ॥ ५३ ॥
ईरिणे निर्जले देशे कण्टकिद्रुमसंकुले।
अश्मस्थाणुक्षुपाकीर्णे सुदुर्गे विषमोत्कटे।
गृहीतं भुजगेन्द्रेण निश्चेष्टमनुजं तदा ॥ ५४ ॥

तब उन्हीं पद-चिह्नोंके सहारे जाकर उन्होंने पर्वतकी कन्दरामें अपने भाई भीमसेनको देखा, जो अजगरकी पकड़में आकर चेष्टाशून्य हो गये थे। उक्त पर्वतकी कन्दरामें विशेष रूपसे रूक्ष वायु चलती थी। वह गुफा ऐसे वृक्षोंसे ढकी थी, जिनमें नाममात्रके लिये भी पत्ते नहीं थे। इतना ही नहीं, वह स्थान ऊसर, निर्जल, काँटेदार वृक्षोंसे भरा हुआ, पत्थर, ठूँठ और छोटे वृक्षोंसे व्याप्त, अत्यन्त दुर्गम और ऊँचा-नीचा था ।। ५३-५४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरभीमदर्शने एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरको भीमसेनके दर्शनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७९ ।।

१८०-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना

वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम् । दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सर्पके शरीरसे बँधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेनके पास पहुँचकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने इस प्रकार पूछा— ॥ १ ॥ कुन्तीमातः कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान् । कश्चायं पर्वताभोगप्रतिमः पन्नगोत्तमः ॥ २ ॥ स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् । कथयामास तत् सर्वं ग्रहणादि विचेष्टितम् ॥ ३ ॥ 'कुन्तीनन्दन! तुम कैसे इस विपत्तिमें फँस गये? और यह पर्वतके समान लम्बा-चौड़ा श्रेष्ठ नाग कौन है?' अपने बड़े भ्राता धर्मराज युधिष्ठिरको वहाँ उपस्थित देख भाई भीमसेनने अपने पकड़े जाने आदिकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं ॥ २-३ ॥

भीम उवाच अयमार्य महासत्वो भक्षार्थं मां गृहीतवान् । नहुषो नाम राजर्षिः प्राणवानिव संस्थितः ॥ ४ ॥ भीम बोले—आर्य! ये वायुभक्षी सर्पके रूपमें बैठे हुए महान् शक्तिशाली साक्षात् राजर्षि नहुष हैं, इन्होंने मुझे अपना आहार बनानेके लिये पकड़ रखा है ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच मुच्यतामयमायुष्मन् भ्राता मेऽमितविक्रमः । वयमाहारमन्यं ते दास्यामः क्षुन्निवारणम् ॥ ५ ॥ तब युधिष्ठिरने सर्पसे कहा—आयुष्मन्! आप मेरे इस अनन्त पराक्रमी भाईको छोड़ दें। हमलोग आपकी भूख मिटानेके लिये दूसरा भोजन देंगे ॥ ५ ॥

सर्प उवाच आहाते राजपुत्रोऽयं मया प्राप्तो मुखागतः । गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत् ॥ ६ ॥

**सर्प बोला—**राजन्! यह राजकुमार मेरे मुखके पास स्वयं आकर मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है। तुम जाओ, यहाँ ठहरना उचित नहीं है; अन्यथा कलतक तुम भी मेरे आहार बन जाओगे ।। ६ ।।

व्रतमेतन्महाबाहो विषयं मम यो व्रजेत् ।
स मे भक्षो भवेत् तात त्वं चापि विषये मम ।। ७ ।।
महाबाहो! मेरा यह नियम है कि मेरी अधिकृत भूमिके भीतर जो भी आ जायगा, वह मेरा भक्ष्य बन जायगा। तात! इस समय तुम भी मेरे अधिकारकी सीमामें ही आ गये हो ।। ७ ।।

चिरेणाद्य मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।
नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यमभिकाङ्क्षये ।। ८ ।।
दीर्घकालतक उपवास करनेके बाद आज यह तुम्हारा छोटा भाई मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है, अतः न तो मैं इसे छोड़ूँगा और न इसके बदलेमें दूसरा आहार ही लेना चाहता हूँ ।। ८ ।।

युधिष्ठिर उवाच

देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान् यदि ।

सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिरः । किमर्थं च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजङ्गम ॥ ९ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**सर्प! तुम कोई देवता हो या दैत्य अथवा वास्तवमें सर्प ही हो? सच बताओ, तुमसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहा है। भुजंगम! किस लिये तुमने भीमसेनको ही अपना ग्रास बनाया है? ॥ ९ ॥

किमाहृत्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद् भुजङ्गम । किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुञ्चेद् भवानिमम् ॥ १० ॥ बोलो, तुम्हारे लिये क्या ला दिया जाय? अथवा तुम्हें किस बातका ज्ञान करा दिया जाय? जिससे तुम प्रसन्न होओगे। मैं कौन-सा आहार दे दूँ अथवा किस उपायका अवलम्बन करूँ, जिससे तुम इन्हें छोड़ सकते हो? ॥ १० ॥

सर्प उवाच

नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ । प्रथितः पञ्चमः सोमादायुः पुत्रो नराधिप ॥ ११ ॥ **सर्प बोला—**निष्पाप नरेश! मैं पूर्वजन्ममें तुम्हारा विख्यात पूर्वज नहुष नामका राजा था। चन्द्रमासे पाँचवीं पीढ़ीमें जो आयु नामक राजा हुए थे, उन्हींका मैं पुत्र हूँ ॥ ११ ॥

क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्यायेन दमेन च । त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तोऽहं विक्रमेण च ॥ १२ ॥ मैंने अनेक यज्ञ किये, तपस्या की, स्वाध्याय किया तथा अपने मन और इन्द्रियोंके संयमरूप योगका अभ्यास किया। इन सत्कर्मोंसे तथा अपने पराक्रमसे भी मुझे तीनों लोकोंका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त हुआ था ॥ १२ ॥

तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत् तदा । सहस्रं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम ॥ १३ ॥ ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमन्य ततो द्विजान् । इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ॥ १४ ॥ न तु मामजहात् प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव । तस्यैवानुग्रहाद् राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ तब उस ऐश्वर्यको पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने सहस्रों ब्राह्मणोंसे अपनी पालकी ढुलवायी। तदनन्तर ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मैंने बहुत-से ब्राह्मणोंका अपमान किया। पृथ्वीपते! इससे कुपित हुए महर्षि अगस्त्यने मुझे इस अवस्थाको पहुँचा दिया। पाण्डुनन्दन नरेश! उन्हीं महात्मा अगस्त्यकी कृपासे आजतक मेरी स्मरणशक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। (मेरी स्मृति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है) ॥ १३—१५ ॥

षष्ठे काले मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।

नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यदपि कामये ॥ १६ ॥
महर्षिके शापके अनुसार दिनके छठे भागमें तुम्हारा यह छोटा भाई मुझे भोजनके रूपमें प्राप्त हुआ है। अतः मैं न तो इसे छोड़ूँगा और न इसके बदले दूसरा आहार लेना चाहता हूँ ॥ १६ ॥

प्रश्नानुच्चारितानद्य व्याहरिष्यसि चेन्मम ।
अथ पश्चाद् विमोक्ष्यामि भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥ १७ ॥
परंतु एक बात है, यदि तुम मेरे पूछे हुए कुछ प्रश्नोंका अभी उत्तर दे दोगे, तो उसके बाद मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको छोड़ दूँगा ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ब्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ।
अपि चेच्छक्नुयां प्रीतिमाहर्तुं ते भुजङ्गम ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने कहा— सर्प! तुम इच्छानुसार प्रश्न करो। मैं तुम्हारी बातका उत्तर दूँगा। भुजंगम! यदि हो सका, तो तुम्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १८ ॥

वेद्यं च ब्राह्मणेनेह तद् भवान् वेत्ति केवलम् ।
सर्पराज ततः श्रुत्वा प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ॥ १९ ॥
सर्पराज! ब्राह्मणको इस जीवनमें जो कुछ जानना चाहिये, वह केवल तत्त्व तुम जानते हो या नहीं। यह सुनकर मैं तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा ॥ १९ ॥

सर्प उवाच

ब्राह्मणः को भवेद् राजन् वेद्यं किं च युधिष्ठिर ।
ब्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे ॥ २० ॥
सर्प बोला— राजा युधिष्ठिर! यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है और उसके लिये जाननेयोग्य तत्त्व क्या है? तुम्हारी बातें सुननेसे मुझे ऐसा अनुमान होता है कि तुम अतिशय बुद्धिमान् हो ॥ २० ॥

युधिष्ठिर उवाच

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा ।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— नागराज! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरताका अभाव, तपस्या और दया—से सद्गुण दिखायी देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है ॥ २१ ॥

वेद्यं सर्प परं ब्रह्म निर्दुःखमसुखं च यत् ।
यत्र गत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितम् ॥ २२ ॥

सर्प! जाननेयोग्य तत्त्व तो परम ब्रह्म ही है, जो दुःख और सुखसे परे है तथा जहाँ पहुँचकर अथवा जिसे जानकर मनुष्य शोकके पार हो जाता है। बताओ, तुम्हें अब इस विषयमें क्या कहना है? ।। २२ ।।

सर्प उवाच

चातुर्वर्ण्यं प्रमाणं च सत्यं च ब्रह्म चैव हि ।
शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च ।
आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर ।। २३ ।।
सर्प बोला— युधिष्ठिर! सत्य एवं प्रमाणभूत ब्रह्म तो चारों वर्णोंके लिये हितकर है। सत्य, दान, अक्रोध, क्रूरताका अभाव, अहिंसा और दया आदि सद्गुण तो शूद्रोंमें भी रहते हैं ।। २३ ।।

वेद्यं यच्चात्र निर्दुःखमसुखं च नराधिप ।
ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षये ।। २४ ।।
नरेश्वर! तुमने यहाँ जो जाननेयोग्य तत्त्वको दुःख और सुखसे परे बताया है, सो दुःख और सुखसे रहित किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता ही मैं नहीं देखता हूँ ।। २४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ।। २५ ।।
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः ।
यत्रैतन्न भवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ।। २६ ।।
युधिष्ठिरने कहा— यदि शूद्रमें सत्य आदि उपर्युक्त लक्षण हैं और ब्राह्मणमें नहीं हैं तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। सर्प! जिसमें ये सत्य आदि लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणोंका अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिये ।। २५-२६ ।।

यत् पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतीति च ।
ताभ्यां हीनमतोऽन्यत्र पदमस्तीति चेदपि ।। २७ ।।
एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं न विद्यते ।
यथा शीतोष्णयोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ।। २८ ।।
एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् ।
एषा मम मतिः सर्प यथा वा मन्यते भवान् ।। २९ ।।
अब तुमने जो यह कहा कि सुख-दुःखसे रहित कोई दूसरा वेद्य तत्त्व है ही नहीं, सो तुम्हारा यह मत ठीक है। सुख-दुःखसे शून्य कोई पदार्थ नहीं है। किंतु एक ऐसा पद है भी। जिस प्रकार बर्फमें उष्णता और अग्निमें शीतलता कहीं नहीं रहती, उसी प्रकार जो वेद्य-पद

है, वह वास्तवमें सुख-दुःखसे रहित ही है। नागराज! मेरा तो यही विचार है, फिर आप जैसा मानें॥ २७—२९॥

सर्प उवाच

यदि ते वृत्ततो राजन् ब्राह्मणः प्रसमीक्षितः ।
वृथा जातिस्तदाऽऽयुष्मन् कृतिर्यावन्न विद्यते ॥ ३० ॥
**सर्प बोला—**आयुष्मन् नरेश! यदि आचारसे ही ब्राह्मणकी परीक्षा की जाय, तब तो जबतक उसके अनुसार कर्म न हो जाति व्यर्थ ही है॥ ३०॥

युधिष्ठिर उवाच

जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते ।
संकरात् सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥ ३१ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महासर्प! महामते! मनुष्योंमें जातिकी परीक्षा करना बहुत ही कठिन है; क्योंकि इस समय सभी वर्णोंका परस्पर संकर (सम्मिश्रण) हो रहा है, ऐसा मेरा विचार है॥ ३१॥

सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नराः ।
वाङ्मैथुनमथो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥ ३२ ॥
इदमार्षं प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि ।
तस्माच्छीलं प्रधानेष्टं विदुर्यै तत्त्वदर्शिनः ॥ ३३ ॥
सभी मनुष्य सदा सब जातियोंकी स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न कर रहे हैं। वाणी, मैथुन तथा जन्म और मरण—ये सब मनुष्योंमें एक-से देखे जाते हैं। इस विषयमें यह आर्षप्रमाण भी मिलता है—‘ये यजामहे’ यह श्रुति जातिका निश्चय न होनेके कारण ही जो हमलोग यज्ञ कर रहे हैं, ऐसा सामान्यरूपसे निर्देश करती है। इसलिये जो तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, वे शीलको ही प्रधानता देते हैं और उसे ही अभीष्ट मानते हैं॥ ३२-३३॥

प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते ।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥ ३४ ॥
जब बालकका जन्म होता है, तब नालच्छेदनके पूर्व उसका जातकर्म-संस्कार किया जाता है। उसमें उसकी माता सावित्री कहलाती है और पिता आचार्य॥

तावच्छूद्रसमो ह्येष यावद् वेदे न जायते ।
तस्मिन्नेवं मतिद्वैधे मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३५ ॥
कृतकृत्याः पुनर्वर्णा यदि वृत्तं न विद्यते ।
संकरस्त्वत्र नागेन्द्र बलवान् प्रसमीक्षितः ॥ ३६ ॥
जबतक बालकका संस्कार करके उसे वेदका स्वाध्याय न कराया जाय, तबतक वह शूद्रहीके समान है। जातिविषयक संदेह होनेपर स्वायम्भुव मनुने यही निर्णय दिया है।

नागराज! यदि वैदिक संस्कार करके वेदाध्ययन करनेपर भी ब्राह्मणादि वर्णोंमें अपेक्षित शील और सदाचारका उदय नहीं हुआ तो उसमें प्रबल वर्णसंकरता है, ऐसा विचारपूर्वक निश्चय किया गया है ।।

यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते ।
तं ब्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान् भुजगोत्तम ।। ३७ ।।
महासर्प! भुजंगमप्रवर! इस समय जिसमें संस्कारके साथ-साथ सदाचारकी उपलब्धि हो, वही ब्राह्मण है। यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।। ३७ ।।

सर्प उवाच

श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर ।
भक्षयेयमहं कस्माद् भ्रातरं ते वृकोदरम् ।। ३८ ।।
**सर्प बोला—**युधिष्ठिर! तुम जाननेयोग्य सभी बातें जानते हो। मैंने तुम्हारी बात अच्छी तरह सुन ली। अब मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको कैसे खा सकता हूँ? ।। ३८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरसर्पसंवादे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरसर्पसंवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।

१८१-

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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना

युधिष्ठिर उवाच
भवानेतादृशो लोके वेदवेदाङ्गपारगः ।
ब्रूहि किं कुर्वतः कर्म भवेद् गतिरनुत्तमा ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तुम सम्पूर्ण वेद-वेदांगोंके पारगामी हो। लोकमें तुम्हारी ऐसी ही ख्याति है। बताओ, किस कर्मके आचरणसे सर्वोत्तम गति प्राप्त हो सकती है? ॥ १ ॥

सर्प उवाच
पात्रे दत्त्वा प्रियाण्युक्त्वा सत्यमुक्त्वा च भारत ।
अहिंसानिरतः स्वर्गं गच्छेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥
**सर्पने कहा—**भारत! इस विषयमें मेरा विचार यह है कि मनुष्य सत्पात्रको दान देनेसे, सत्य और प्रिय वचन बोलनेसे तथा अहिंसा-धर्ममें तत्पर रहनेसे स्वर्ग (उत्तम गति) पा सकता है ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच
दानाद् वा सर्प सत्याद् वा किमतो गुरु दृश्यते ।
अहिंसाप्रिययोश्चैव गुरुलाघवमुच्यताम् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नागराज! दान और सत्यमें किसका पलड़ा भारी देखा जाता है? अहिंसा और प्रियभाषण—इनमेंसे किसका महत्त्व अधिक है और किसका कम? यह बताओ ॥ ३ ॥

सर्प उवाच
दानं च सत्यं तत्त्वं वा अहिंसा प्रियमेव च ।
एषां कार्यगरीयस्त्वाद् दृश्यते गुरुलाघवम् ॥ ४ ॥
**सर्पने कहा—**महाराज! दान, सत्य-तत्त्व, अहिंसा और प्रियभाषण—इनकी गुरुता और लघुता कार्यकी महत्ताके अनुसार देखी जाती है ॥ ४ ॥
कस्माच्चिद् दानयोगाद्धि सत्यमेव विशिष्यते ।
सत्यवाक्याच्च राजेन्द्र किंचिद् दानं विशिष्यते ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! किसी दानसे सत्यका ही महत्त्व बढ़ जाता है और कोई-कोई दान ही सत्यभाषणसे अधिक महत्त्व रखता है ॥ ५ ॥ एवमेव महेष्वास प्रियवाक्यानमहीपते । अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रियमिष्यते ॥ ६ ॥ महान् धनुर्धर भूपाल! इसी प्रकार कहीं तो प्रिय वचनकी अपेक्षा अहिंसाका गौरव अधिक देखा जाता है और कहीं अहिंसासे भी बढ़कर प्रियभाषणका महत्त्व दृष्टिगोचर होता है ॥ ६ ॥ एवमेतद् भवेद् राजन् कार्यापेक्षमन्तरम् । यदभिप्रेतमन्यत् ते ब्रूहि यावद् ब्रवीम्यहम् ॥ ७ ॥ राजन्! इस प्रकार इनके गौरव-लाघवका निश्चय कार्यकी अपेक्षासे ही होता है। अब और जो कुछ भी प्रश्न तुम्हें अभीष्ट हो, वह पूछो। मैं यथासाध्य उत्तर देता हूँ ॥ ७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् । अशरीरस्य दृश्येत प्रब्रूहि विषयांश्च मे ॥ ८ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**सर्प! मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति और कर्मोंका निश्चयरूपसे मिलनेवाला फल किस प्रकार देखनेमें आता है एवं देहाभिमानसे रहित पुरुषकी गति किस प्रकार होती है? इन विषयोंको मुझसे भलीभाँति कहिये ॥ ८ ॥

सर्प उवाच

तिस्रो वै गतयो राजन् परिदृष्टाः स्वकर्मभिः । मानुषं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत् त्रिधा ॥ ९ ॥ **सर्पने कहा—**राजन्! अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जीवोंकी तीन प्रकारकी गतियाँ देखी जाती हैं—स्वर्गलोककी प्राप्ति, मनुष्ययोनिमें जन्म लेना और पशु-पक्षी आदि योनियोंमें (तथा नरकोंमें) उत्पन्न होना।* बस, ये ही तीन योनियाँ हैं ॥ ९ ॥ तत्र वै मानुषालोकाद् दानादिभिरतन्द्रितः । अहिंसार्थसमायुक्तैः कारणैः स्वर्गमश्नुते ॥ १० ॥ इनमेंसे जो जीव मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है, पर यदि आलस्य और प्रमादका त्याग करके अहिंसाका पालन करते हुए दान आदि शुभ कर्म करता है, तो उसे इन पुण्य कर्मोंके कारण स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥ विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् । तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥ ११ ॥ कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः । मनुष्यत्वात् परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥ १२ ॥

राजेन्द्र! इसके विपरीत कारण उपस्थित होनेपर मनुष्ययोनिमें तथा पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। तात! पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेनेका जो विशेष कारण है, उसे भी यहाँ बतलाया जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ और हिंसामें तत्पर होकर मानवतासे भ्रष्ट हो जाता है, अपनी मनुष्य होनेकी योग्यताको भी खो देता है, वही पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म पाता है ॥ ११-१२ ॥

तिर्यग्योन्‍याः पृथग्भावो मनुष्यार्थे विधीयते । गवादिभ्यस्तथाश्वेभ्यो देवत्वमपि दृश्यते ॥ १३ ॥

फिर मनुष्य-जन्मकी प्राप्तिके लिये उसका तिर्यक्-योनिसे उद्धार होता है। गौओं तथा अश्वोंको भी उस योनिसे छुटकारा मिलकर देवत्वकी प्राप्ति होती है, यह बात देखी जाती है ॥ १३ ॥

सोऽयमेता गतीस्तात जन्तुश्चरति कार्यवान् । नित्ये महति चात्मानमवस्थापयते द्विजः ॥ १४ ॥ जातो जातश्च बलवद् भुङ्क्ते चात्मा स देहवान् । फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजापालनभावनः ॥ १५ ॥

तात! प्रयोजनवश वही यह जीव इन्हीं तीन गतियोंमें भटकता रहता है। कर्मफलको चाहनेवाला देहाभिमानी जीव परवशतासे बार-बार जन्म लेता और दुःख-सुखका उपभोग करता है। किंतु तात! जो कर्मफलमें आसक्त नहीं है, वह प्रजाजनोंके पालनकी भावनावाला द्विज अपने आत्माको नित्य परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित कर देता है ॥ १४-१५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

शब्दे स्पर्शे च रूपे च तथैव रसगन्धयोः । तस्याधिष्ठानमव्यग्रो ब्रूहि सर्प यथातथम् ॥ १६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— सर्प! शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इनका आधार क्या है? आप शान्तचित्त होकर इसे यथार्थरूपसे बताइये ॥ १६ ॥

किं न गृह्णाति विषयान् युगपच्च महामते । एतावदुच्यतां चोक्तं सर्वं पन्नगसत्तम ॥ १७ ॥

महामते! पन्नगश्रेष्ठ! मन विषयोंका एक ही साथ ग्रहण क्यों नहीं करता? इन उपर्युक्त सब बातोंको बताइये ॥

सर्प उवाच

यदात्मद्रव्यमायुष्मन् देहसंश्रयणान्वितम् । करणाधिष्ठितं भोगानुपभुङ्क्ते यथाविधि ॥ १८ ॥

सर्पने कहा— आयुष्मन्! स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंका आश्रय लेनेवाला और इन्द्रियोंसे युक्त जो आत्मा नामक द्रव्य है, वही विधिपूर्वक नाना प्रकारके भोगोंको भोगता है॥ १८॥ ज्ञानं चैवात्र बुद्धिश्च मनश्च भरतर्षभ । तस्य भोगाधिकरणे करणानि निबोध मे ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! ज्ञान, बुद्धि और मन—ये ही शरीरमें उसके करण समझो ॥ १९ ॥ मनसा तात पर्येति क्रमशो विषयानिमान् । विषयायतनस्थो हि भूतात्मा क्षेत्रमास्थितः ॥ २० ॥ तात! पाँचों विषयोंके आधारभूत पंचभूतोंसे बने हुए शरीरमें स्थित जीवात्मा इस शरीरमें स्थित हुआ ही मनके द्वारा क्रमशः इन पाँचों विषयोंका उपभोग करता है ॥ २० ॥ तत्र चापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीयते । तस्माद् युगपदत्रास्य ग्रहणं नोपपद्यते ॥ २१ ॥ नरश्रेष्ठ! विषयोंके उपभोगके समय (बुद्धिके द्वारा) इस जीवात्माका मन किसी एक ही विषयमें नियन्त्रित कर दिया जाता है। इसीलिये उसके द्वारा एक ही साथ अनेक विषयोंका ग्रहण सम्भव नहीं हो पाता है ॥ २१ ॥ स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः । बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम् ॥ २२ ॥ पुरुषसिंह! वही आत्मा दोनों भौंहोंके बीच स्थित होकर उत्तम-अधम बुद्धिको भिन्न-भिन्न द्रव्योंकी ओर प्रेरित करता है ॥ २२ ॥ बुद्धेरुत्तरकाला च वेदना दृश्यते बुधैः । एष वै राजशार्दूल विधिः क्षेत्रज्ञभावनः ॥ २३ ॥ बुद्धिकी क्रियाके उत्तरकालमें भी विद्वान् पुरुषोंको एक अनुभूति दिखायी देती है। नृपश्रेष्ठ! यही क्षेत्रज्ञ आत्माको प्रकाशित करनेवाली विधि है ॥ २३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मनसश्चापि बुद्धेश्च ब्रूहि मे लक्षणं परम् । एतदध्यात्मविदुषां परं कार्यं विधीयते ॥ २४ ॥ युधिष्ठिरने कहा— सर्प! मुझे मन और बुद्धिका उत्तम लक्षण बतलाओ। अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंके लिये इनको जानना परम कर्तव्य कहा गया है ॥ २४ ॥

सर्प उवाच

बुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीयते । तदाश्रिता हि संज्ञैषा बुद्धिस्तस्यैषिणी भवेत् ॥ २५ ॥ बुद्धिरुत्पद्यते कार्यान्मनस्तूत्पन्नमेव हि ।

बुद्धेर्गुणविधानेन मनस्तद्गुणवद् भवेत् ।। २६ ।।

सर्पने कहा—तात! आत्माके भोग और मोक्षका सम्पादन करना ही बुद्धिका प्रयोजन

है तथा आत्माका आश्रय लेकर ही बुद्धि विषयोंकी ओर जाती है। इस कारण वह

आत्माका अनुसरण करनेवाली मानी जाती है। वह भी आत्माकी चेतनशक्तिके सम्बन्धसे

ही है तथा बुद्धिके गुणविधानसे अर्थात् उसकी ज्ञानशक्तिके प्रभावसे ही मन उस गुणसे

सम्पन्न होता है यानी इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है। अतः बुद्धि तो

कार्यके आरम्भसे प्रकट होती है और मन सदैव प्रकट रहता है। (कार्यको देखकर ही

कारणकी सत्ता व्यक्त होती है—यह न्याय है) ।। २५-२६ ।।

एतद् विशेषणं तात मनोबुद्धयोर्यदन्तरम् ।

त्वमप्यत्राभिसम्बुद्धः कथं वा मन्यते भवान् ।। २७ ।।

तात! मन और बुद्धिकी यह विशेषता ही उन दोनोंका अन्तर है। तुम भी तो इस

विषयके अच्छे ज्ञाता हो, अतः बताओ, तुम्हारी कैसी मान्यता है? ।। २७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

अहो बुद्धिमतां श्रेष्ठ शुभा बुद्धिरियं तव ।

विदितं वेदितव्यं ते कस्मात् समनुपृच्छसि ।। २८ ।।

युधिष्ठिर बोले—बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ! तुम्हारी यह बुद्धि बड़ी उत्तम है। तुम तो जानने

योग्य वस्तुको जान चुके हो, फिर मुझसे क्यों पूछते हो? ।। २८ ।।

सर्वज्ञं त्वां कथं मोह आविशत् स्वर्गवासिनम् ।

एवमद्भुतकम्माणमिति मे संशयो महान् ।। २९ ।।

तुम तो सर्वज्ञ तथा स्वर्गके निवासी थे। तुमने बड़े अद्भुत कर्म किये थे। भला, तुम्हें कैसे

मोह हो गया? (अर्थात् ब्राह्मणोंका अपमान कैसे कर बैठे?) इस बातको लेकर मेरे मनमें

बड़ा संशय हो रहा है ।। २९ ।।

सर्प उवाच

सुप्रज्ञमपि चेच्छूरमृद्धिर्मोहयते नरम् ।

वर्तमानः सुखे सर्वो मुह्यतीति मतिर्मम ।। ३० ।।

सर्पने कहा—राजन्! यह धन-सम्पत्ति बड़े-बड़े बुद्धिमान् और शूरवीर मनुष्यको भी

मोहमें डाल देती है। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुख-विलासमें डूबे हुए सभी लोग मोहित

हो जाते हैं ।। ३० ।।

सोऽहमैश्वर्यमोहेन मदाविष्टो युधिष्ठिर ।

पतितः प्रतिसम्बुद्धस्त्वां तु सम्बोधयाम्यहम् ।। ३१ ।।

युधिष्ठिर! इसी तरह मैं भी ऐश्वर्यके मोहसे मदोन्मत्त हो गया और मुझे उस समय चेत

हुआ, जब कि मेरा अधःपतन हो चुका। अतः अब तुम्हें सचेत कर रहा हूँ ।। ३१ ।।

कृतं कार्यं महाराज त्वया मम परंतप । क्षीणःशापः सुकृच्छ्रो मे त्वया सम्भाष्य साधुना ॥ ३२ ॥ परंतप महाराज! आज तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य किया। इस समय तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुषसे वार्तालाप करनेके कारण मेरा वह अत्यन्त कष्टदायक शाप निवृत्त हो गया ॥ ३२ ॥ अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन् पुरा । अभिमानेन मत्तः सन् कंचिन्नान्यमचिन्तयम् ॥ ३३ ॥ पूर्वकालमें (जब मैं स्वर्गका राजा था,) दिव्य विमानपर चढ़कर आकाशमें विचरता रहता था। उस समय अभिमानसे मत्त होकर मैं दूसरे किसीको कुछ नहीं समझता था ॥ ३३ ॥ ब्रह्मर्षिदेवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । करान् मम प्रयच्छन्ति सर्वे त्रैलोक्यवासिनः ॥ ३४ ॥ ब्रह्मर्षि, देवता गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि जो भी इस त्रिलोकीमें निवास करनेवाले प्राणी थे, वे सब मुझे कर देते थे ॥ ३४ ॥ चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते । तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि-दृष्टेर्बलं मम ॥ ३५ ॥ राजन्! उन दिनों मैं जिस प्राणीकी ओर आँख उठाकर देखता था, उसका तेज तत्काल हर लेता था। यह थी मेरी दृष्टिकी शक्ति ॥ ३५ ॥ ब्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिबिकां मम । स मामपनयो राजन् भ्रंशयामास वै श्रियः ॥ ३६ ॥ हजारों ही ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोते थे। महाराज! मेरे इसी अत्याचारने मुझे स्वर्गकी राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ३६ ॥ तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन् स्पृष्टो मया मुनिः । अगस्त्येन ततोऽस्म्युक्तः सर्पस्त्वं च भवेति ह ॥ ३७ ॥ स्वर्गमें मुनिवर अगस्त्य जब मेरी पालकी ढो रहे थे, तब मैंने उन्हें लात मारी, इसलिये उन्होंने मुझे ऐसा कहा कि 'तू निश्चय ही सर्प हो जा' ॥ ३७ ॥ ततस्तस्माद् विमानाग्र्यात् प्रच्युतश्च्युतलक्षणः । प्रपतन् बुबुधेऽत्मानं व्यालीभूतमधोमुखम् । आयाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति ॥ ३८ ॥ उनके इतना कहते ही मेरे सभी राजचिह्न लुप्त हो गये। मैं (सर्प होकर) उस उत्तम विमानसे नीचे गिरा। उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि मैं सर्प होकर नीचे मुँह किये गिर रहा हूँ; तब मैंने शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन ब्रह्मर्षिसे याचना करते हुए कहा ॥ ३८ ॥ सर्प उवाच