महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! किसी दानसे सत्यका ही महत्त्व बढ़ जाता है और कोई-कोई दान ही सत्यभाषणसे अधिक महत्त्व रखता है ॥ ५ ॥ एवमेव महेष्वास प्रियवाक्यानमहीपते । अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रियमिष्यते ॥ ६ ॥ महान् धनुर्धर भूपाल! इसी प्रकार कहीं तो प्रिय वचनकी अपेक्षा अहिंसाका गौरव अधिक देखा जाता है और कहीं अहिंसासे भी बढ़कर प्रियभाषणका महत्त्व दृष्टिगोचर होता है ॥ ६ ॥ एवमेतद् भवेद् राजन् कार्यापेक्षमन्तरम् । यदभिप्रेतमन्यत् ते ब्रूहि यावद् ब्रवीम्यहम् ॥ ७ ॥ राजन्! इस प्रकार इनके गौरव-लाघवका निश्चय कार्यकी अपेक्षासे ही होता है। अब और जो कुछ भी प्रश्न तुम्हें अभीष्ट हो, वह पूछो। मैं यथासाध्य उत्तर देता हूँ ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् । अशरीरस्य दृश्येत प्रब्रूहि विषयांश्च मे ॥ ८ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**सर्प! मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति और कर्मोंका निश्चयरूपसे मिलनेवाला फल किस प्रकार देखनेमें आता है एवं देहाभिमानसे रहित पुरुषकी गति किस प्रकार होती है? इन विषयोंको मुझसे भलीभाँति कहिये ॥ ८ ॥
सर्प उवाच
तिस्रो वै गतयो राजन् परिदृष्टाः स्वकर्मभिः । मानुषं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत् त्रिधा ॥ ९ ॥ **सर्पने कहा—**राजन्! अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जीवोंकी तीन प्रकारकी गतियाँ देखी जाती हैं—स्वर्गलोककी प्राप्ति, मनुष्ययोनिमें जन्म लेना और पशु-पक्षी आदि योनियोंमें (तथा नरकोंमें) उत्पन्न होना।* बस, ये ही तीन योनियाँ हैं ॥ ९ ॥ तत्र वै मानुषालोकाद् दानादिभिरतन्द्रितः । अहिंसार्थसमायुक्तैः कारणैः स्वर्गमश्नुते ॥ १० ॥ इनमेंसे जो जीव मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है, पर यदि आलस्य और प्रमादका त्याग करके अहिंसाका पालन करते हुए दान आदि शुभ कर्म करता है, तो उसे इन पुण्य कर्मोंके कारण स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥ विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् । तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥ ११ ॥ कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः । मनुष्यत्वात् परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥ १२ ॥