महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! इसके विपरीत कारण उपस्थित होनेपर मनुष्ययोनिमें तथा पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। तात! पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेनेका जो विशेष कारण है, उसे भी यहाँ बतलाया जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ और हिंसामें तत्पर होकर मानवतासे भ्रष्ट हो जाता है, अपनी मनुष्य होनेकी योग्यताको भी खो देता है, वही पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म पाता है ॥ ११-१२ ॥
तिर्यग्योन्याः पृथग्भावो मनुष्यार्थे विधीयते । गवादिभ्यस्तथाश्वेभ्यो देवत्वमपि दृश्यते ॥ १३ ॥
फिर मनुष्य-जन्मकी प्राप्तिके लिये उसका तिर्यक्-योनिसे उद्धार होता है। गौओं तथा अश्वोंको भी उस योनिसे छुटकारा मिलकर देवत्वकी प्राप्ति होती है, यह बात देखी जाती है ॥ १३ ॥
सोऽयमेता गतीस्तात जन्तुश्चरति कार्यवान् । नित्ये महति चात्मानमवस्थापयते द्विजः ॥ १४ ॥ जातो जातश्च बलवद् भुङ्क्ते चात्मा स देहवान् । फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजापालनभावनः ॥ १५ ॥
तात! प्रयोजनवश वही यह जीव इन्हीं तीन गतियोंमें भटकता रहता है। कर्मफलको चाहनेवाला देहाभिमानी जीव परवशतासे बार-बार जन्म लेता और दुःख-सुखका उपभोग करता है। किंतु तात! जो कर्मफलमें आसक्त नहीं है, वह प्रजाजनोंके पालनकी भावनावाला द्विज अपने आत्माको नित्य परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित कर देता है ॥ १४-१५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
शब्दे स्पर्शे च रूपे च तथैव रसगन्धयोः । तस्याधिष्ठानमव्यग्रो ब्रूहि सर्प यथातथम् ॥ १६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सर्प! शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इनका आधार क्या है? आप शान्तचित्त होकर इसे यथार्थरूपसे बताइये ॥ १६ ॥
किं न गृह्णाति विषयान् युगपच्च महामते । एतावदुच्यतां चोक्तं सर्वं पन्नगसत्तम ॥ १७ ॥
महामते! पन्नगश्रेष्ठ! मन विषयोंका एक ही साथ ग्रहण क्यों नहीं करता? इन उपर्युक्त सब बातोंको बताइये ॥
सर्प उवाच
यदात्मद्रव्यमायुष्मन् देहसंश्रयणान्वितम् । करणाधिष्ठितं भोगानुपभुङ्क्ते यथाविधि ॥ १८ ॥