महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्पने कहा— आयुष्मन्! स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंका आश्रय लेनेवाला और इन्द्रियोंसे युक्त जो आत्मा नामक द्रव्य है, वही विधिपूर्वक नाना प्रकारके भोगोंको भोगता है॥ १८॥ ज्ञानं चैवात्र बुद्धिश्च मनश्च भरतर्षभ । तस्य भोगाधिकरणे करणानि निबोध मे ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! ज्ञान, बुद्धि और मन—ये ही शरीरमें उसके करण समझो ॥ १९ ॥ मनसा तात पर्येति क्रमशो विषयानिमान् । विषयायतनस्थो हि भूतात्मा क्षेत्रमास्थितः ॥ २० ॥ तात! पाँचों विषयोंके आधारभूत पंचभूतोंसे बने हुए शरीरमें स्थित जीवात्मा इस शरीरमें स्थित हुआ ही मनके द्वारा क्रमशः इन पाँचों विषयोंका उपभोग करता है ॥ २० ॥ तत्र चापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीयते । तस्माद् युगपदत्रास्य ग्रहणं नोपपद्यते ॥ २१ ॥ नरश्रेष्ठ! विषयोंके उपभोगके समय (बुद्धिके द्वारा) इस जीवात्माका मन किसी एक ही विषयमें नियन्त्रित कर दिया जाता है। इसीलिये उसके द्वारा एक ही साथ अनेक विषयोंका ग्रहण सम्भव नहीं हो पाता है ॥ २१ ॥ स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः । बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम् ॥ २२ ॥ पुरुषसिंह! वही आत्मा दोनों भौंहोंके बीच स्थित होकर उत्तम-अधम बुद्धिको भिन्न-भिन्न द्रव्योंकी ओर प्रेरित करता है ॥ २२ ॥ बुद्धेरुत्तरकाला च वेदना दृश्यते बुधैः । एष वै राजशार्दूल विधिः क्षेत्रज्ञभावनः ॥ २३ ॥ बुद्धिकी क्रियाके उत्तरकालमें भी विद्वान् पुरुषोंको एक अनुभूति दिखायी देती है। नृपश्रेष्ठ! यही क्षेत्रज्ञ आत्माको प्रकाशित करनेवाली विधि है ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मनसश्चापि बुद्धेश्च ब्रूहि मे लक्षणं परम् । एतदध्यात्मविदुषां परं कार्यं विधीयते ॥ २४ ॥ युधिष्ठिरने कहा— सर्प! मुझे मन और बुद्धिका उत्तम लक्षण बतलाओ। अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंके लिये इनको जानना परम कर्तव्य कहा गया है ॥ २४ ॥
सर्प उवाच
बुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीयते । तदाश्रिता हि संज्ञैषा बुद्धिस्तस्यैषिणी भवेत् ॥ २५ ॥ बुद्धिरुत्पद्यते कार्यान्मनस्तूत्पन्नमेव हि ।