महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृष्णां सभायामवशामपश्यत् । अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं सहेत तत् पाण्डव कस्त्वदन्यः ॥ २० ॥ 'पाण्डुनन्दन! कुरुजांगलदेशकी जनताने द्यूतसभामें द्रौपदीको जिस विवश-अवस्थामें देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण बर्ताव किया गया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था? ॥ २० ॥ असंशयं सर्वसमृद्धकामः क्षिप्रं प्रजाः पालयितासि सम्यक् । इमे वयं निग्रहणे कुरूणां यदि प्रतिज्ञा भवतः समाप्ता ॥ २१ ॥ 'धर्मराज! अब शीघ्र ही आपके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और आप राजसिंहासनपर आरूढ़ होकर न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यदि आपकी वनवासविषयक प्रतिज्ञा पूरी हो जाय, तो हम सब लोग आपके विरोधी कौरवोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हैं' ॥ २१ ॥ धौम्यं च भीमं च युधिष्ठिरं च यमौ च कृष्णां च दशार्हसिंहः । उवाच दिष्ट्या भवतां शिवेन प्राप्तः किरीटी मुदितः कृतास्त्रः ॥ २२ ॥ तदनन्तर यदुकुलसिंह भगवान् श्रीकृष्णने धौम्य, युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव और द्रौपदीकी ओर देखते हुए कहा—'सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंद्वारा की हुई मंगलकामनासे किरीटधारी अर्जुन अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् होकर सानन्द लौट आये हैं' ॥ २२ ॥ प्रोवाच कृष्णामपि याज्ञसेनीं दशार्हभर्ता सहितः सुहृद्भिः । दिष्ट्या समग्रासि धनंजयेन समागतेत्येवमुवाच कृष्णः ॥ २३ ॥ कृष्णे धनुर्वेदरतिप्रधाना- स्तवात्मजास्ते शिशवः सुशीलाः । सद्भिः सदैवचरितं सुहृद्भि- श्र्ररन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि ॥ २४ ॥ इसके बाद दशार्हकुलके स्वामी श्रीकृष्ण, जो अपने सुहृदोंसे घिरे हुए थे, यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीसे बोले—'कृष्णे! अर्जुनसे मिलकर तेरी सारी कामना सफल हो गयी, यह बड़े