भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1240

आनन्दकी बात है। तेरे पुत्र बड़े सुशील हैं। धनुर्वेदमें उनका विशेष अनुराग है। वे अपने सुहृदोंसहित सत्पुरुषोंद्वारा आचरित सदाचार और धर्मका पालन करते हैं ॥ २३-२४ ॥ राज्येन राष्ट्रैश्च निमन्त्र्यमाणाः पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्च । न यज्ञसेनस्य न मातुलानां गृहेषु बाला रतिमाप्नुवन्ति ॥ २५ ॥ ‘कृष्णे! तुम्हारे पिता और भाइयोंने राज्य तथा राजकीय उपकरणों—यान-वाहन आदिकी सुविधा दिखाकर अनेक बार आमन्त्रित किया, तो भी तुम्हारे बच्चे अपने नाना यज्ञसेन और मामा धृष्टद्युम्न आदिके घरोंमें रहना पसंद नहीं करते हैं—वहाँ उनका मन नहीं लगता है ॥ २५ ॥ आनर्तमेवाभिमुखाः शिवेन गत्वा धनुर्वेदरतिप्रधानाः । तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य न दैवतेभ्यः स्पृहयन्ति कृष्णे ॥ २६ ॥ ‘कृष्णे! उनका धनुर्वेदमें विशेष प्रेम है। वे आनर्त देशमें ही कुशलपूर्वक जाकर वृष्णिपुरी द्वारकामें रहते हैं। वहाँ रहकर उन्हें देवताओंके लोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं होती ॥ २६ ॥ यथा त्वमेवार्हसि तेषु वृत्तं प्रयोक्तुमार्या च तथैव कुन्ती । तेष्वप्रमादेन तथा करोति तथैव भूयश्च तथा सुभद्रा ॥ २७ ॥ ‘उन बालकोंको तुम सदाचारकी जैसी शिक्षा दे सकती हो, आर्या कुन्ती भी उन्हें जैसा सदाचार सिखा सकती हैं, वैसी शिक्षा देनेकी योग्यता सुभद्रामें भी है। वह बड़ी सावधानीके साथ वैसी ही शिक्षा देकर उन सब बालकोंको सदाचारमें प्रतिष्ठित करती है ॥ २७ ॥ यथानिरुद्धस्य यथाभिमन्यो- र्यथा सुनीथस्य तथैव भानोः । तथा विनेता च गतिश्च कृष्णे तवात्मजानामपि रौक्मिणेयः ॥ २८ ॥ ‘कृष्णे! रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न जिस प्रकार अनिरुद्ध, अभिमन्यु, सुनीथ और भानुको धनुर्वेदकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार वे तुम्हारे पुत्रोंके भी शिक्षक और संरक्षक हैं ॥ २८ ॥ गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा- नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वयाने । सम्यग् विनेता विनयत्यतन्द्र-