महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1241, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तांश्चाभिमन्युः सततं कुमारः ॥ २९ ॥ ‘शिक्षा देनेमें निपुण और आलस्यरहित कुमार अभिमन्यु तुम्हारे शूर-वीर पुत्रोंको गदा और ढाल-तलवारके दाँव-पेंच सिखाते हैं। अन्यान्य अस्त्रोंकी भी शिक्षा देते हैं। साथ ही रथ चलाने और घोड़े हाँकनेकी कला भी सिखाते हैं। वे सदा उनकी शिक्षा-दीक्षामें संलग्न रहते हैं ॥ २९ ॥
स चापि सम्यक् प्रणिधाय शिक्षां शस्त्राणि चैषां विधिवत् प्रदाय । तवात्मजानां च तथाभिमन्योः पराक्रमैस्तुष्यति रौक्मिणेयः ॥ ३० ॥ ‘अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगकी उत्तम शिक्षा दे उनके लिये उन्होंने विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र भी दे रखे हैं। तुम्हारे पुत्रों और अभिमन्युके पराक्रम देखकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न बहुत संतुष्ट रहते हैं ॥ ३० ॥
यदा विहारं प्रसमीक्षमाणाः प्रयान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि । एकैकमेषामनुयान्ति तत्र रथाश्च यानानि च दन्तिनश्च ॥ ३१ ॥ ‘याज्ञसेनी! तुम्हारे पुत्र जब नगरकी शोभा देखनेके लिये घूमने निकलते हैं, उस समय उनमेंसे प्रत्येकके लिये रथ, घोड़े, हाथी और पालकी आदि सवारियाँ पीछे-पीछे जाती हैं’ ॥ ३१ ॥
अथाब्रवीद् धर्मराजं तु कृष्णो दशार्हयोधाः कुकुरान्धकाश्च । एते निदेशं तव पालयन्त- स्तिष्ठन्तु यत्रेच्छसि तत्र राजन् ॥ ३२ ॥ तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—‘राजन्! दशार्ह, कुकुर और अंधकवंशके योद्धा जहाँ आप चाहें, वहीं आपकी आज्ञाका पालन करते हुए खड़े रह सकते हैं ॥ ३२ ॥
आवर्त्ततां कार्मुकवेगवाता हलायुधप्रग्रहणा मधूनाम् । सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा ॥ ३३ ॥ ‘नरेन्द्र! जिसके धनुषका वेग वायुवेगके समान हैं, हल धारण करनेवाले बलरामजी जिसके सेनापति हैं, वह सवारोंसहित हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरी हुई मथुरा-