भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1242

प्रान्तवासी गोपोंकी चतुरंगिणी सेना सदा युद्धके लिये संनद्ध हो आपकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये निरन्तर तत्पर रहती है ॥ ३३ ॥

प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्रः सुयोधनः पापकृतां वरिष्ठः । स सानुबन्धः ससुहृद्रणञ्च भौमस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम् ॥ ३४ ॥

पाण्डुनन्दन! अब आप पापात्माओंके शिरोमणि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको उसके सुहृदों और सम्बन्धियों-सहित उसी मार्गपर भेज दीजिये, जहाँ भौमासुर और शाल्व गये हैं ॥ ३४ ॥

कामं तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मिन् यथा कृतस्ते समयः सभायाम् । दाशार्हयोधैस्तु हतारियोधं प्रतीक्षतां नागपुरं भवन्तम् ॥ ३५ ॥

‘महाराज! आप चाहें तो सभामें जो प्रतिज्ञा आपने की है, उसीके पालनमें लगे रहें। यदि आपकी आज्ञा हो तो यदुवंशी योद्धा आपके समस्त शत्रुओंको मार डालें और हस्तिनापुर नगर आपके शुभागमनकी प्रतीक्षा करता रहे ॥ ३५ ॥

व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम् । ततः प्रसिद्धं प्रथमं विशोकः प्रपत्स्यसे नागपुरं सुराष्ट्रम् ॥ ३६ ॥

‘राजन्! आप क्रोध, दीनता और दुःखसे दूर रहकर जहाँ-जहाँ आपकी इच्छा हो वहाँ-वहाँ घूम लीजिये। तत्पश्चात् शोकरहित हो अपनी प्रसिद्ध और उत्तम राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश कीजियेगा’ ॥ ३६ ॥

ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा यथावदुक्तं पुरुषोत्तमेन । प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराजः कृताञ्जलिः केशवमित्युवाच ॥ ३७ ॥

पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने अपना मत अच्छी तरह व्यक्त कर दिया था। उसे जानकर महात्मा धर्मराजने भगवान् केशवकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ३७ ॥

असंशयं केशव पाण्डवानां भवान् गतिस्त्वच्छरणा हि पार्थाः । कालोदये तच्च ततश्च भूयः