भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1243

कर्ता भवान् कर्म न संशयोऽस्ति ॥ ३८ ॥ ‘केशव! इसमें संदेह नहीं कि आप ही पाण्डवोंके अवलम्ब हैं। कुन्तीके हम सभी पुत्र आपकी ही शरणमें हैं। जब समय आयेगा, तब आप पुनः अपने इस कथनके अनुसार सब कार्य करेंगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३८ ॥
यथाप्रतिज्ञं विहृतश्च कालः
सर्वाः समा द्वादश निर्जनेषु ।
अज्ञातचर्यां विधिवत् समाप्य
भवद्गताः केशव पाण्डवेयाः ॥ ३९ ॥
एषैव बुद्धिर्जुषतां सदा त्वां
सत्ये स्थिताः केशव पाण्डवेयाः ।
सदानधर्माः सजनाः सदाराः
सबान्धवास्त्वच्छरणा हि पार्थाः ॥ ४० ॥
‘भगवन्! हमने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार बारह वर्षोंका सारा समय निर्जन वनोंमें घूमकर बिता दिया है। अब अज्ञातवासकी अवधि भी विधिपूर्वक पूर्ण कर लेनेपर हम समस्त पाण्डव आपकी आज्ञाके अधीन हो जायँगे। नाथ! आपकी भी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे। ये पाण्डव सदा सत्यके पालनमें संलग्न रहे हैं। प्रभो! दान-धर्मसे युक्त हम सभी कुन्तीपुत्र सेवक, परिजन, स्त्री, पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित केवल आपकी ही शरणमें हैं’ ॥ ३९-४० ॥

वैशम्पायन उवाच
तथा वदति वार्ष्णेये धर्मराजे च भारत ।
अथ पश्चात् तपोवृद्धो बहुवर्षसहस्रधृक् ॥ ४१ ॥
प्रत्यदृश्यत धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपाः ।
अजरश्चामरश्चैव रूपौदार्यगुणान्वितः ॥ ४२ ॥
व्यदृश्यत तथा युक्तो यथा स्यात् पञ्चविंशकः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय अनेक सहस्र वर्षोंकी अवस्थावाले तपोवृद्ध धर्मात्मा महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि आते दिखायी दिये। वे रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा अजर-अमर थे। वैसे बड़े-बूढ़े होनेपर भी वे ऐसे दिखायी दे रहे थे, मानो पच्चीस वर्षकी अवस्थाके तरुण हों ॥
तमागतमृषिं वृद्धं बहुवर्षसहस्रिणम् ॥ ४३ ॥
आनर्चुर्ब्राह्मणाः सर्वे कृष्णश्च सह पाण्डवैः ।
तमर्चितं सुविश्वस्तमासीनमृषिसत्तमम् ।