महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1244, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणानां मतेनाह पाण्डवानां च केशवः ॥ ४४ ॥ हजारों वर्षोंकी अवस्थावाले उन वृद्ध महर्षिके पधारनेपर पाण्डवौंसहित भगवान् श्रीकृष्ण तथा समस्त ब्राह्मणोंने उनका पूजन किया। पूजित होनेपर जब वे अत्यन्त विश्वास करनेयोग्य मुनिश्रेष्ठ आसनपर विराजमान हो गये, तब वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और पाण्डवोंकी सम्मतिसे भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा॥
श्रीकृष्ण उवाच
शुश्रूषवः पाण्डवास्ते ब्राह्मणाश्च समागताः । द्रौपदी सत्यभामा च तथाहं परमं वचः ॥ ४५ ॥ पुरावृत्ताः कथाः पुण्याः सदाचारान् सनातनान् । राज्ञां स्त्रीणामृषीणां च मार्कण्डेय विचक्ष्व नः ॥ ४६ ॥ श्रीकृष्ण बोले— मार्कण्डेयजी! आपके उपदेश सुननेकी इच्छासे यहाँ पाण्डवोंके साथ-साथ बहुत-से ब्राह्मण भी पधारे हुए हैं। द्रौपदी, सत्यभामा तथा मैं, सब लोग आपकी उत्तम वाणीका रसास्वादन करना चाहते हैं। आप प्राचीनकालके नरेशों, नारियों तथा महर्षियोंकी पुरातन पुण्य कथाएँ सुनाइये और हमलोगोंसे सनातन सदाचारका वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारदः । आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोककः ॥ ४७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे सब लोग वहाँ बैठे ही थे कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले देवर्षि नारद भी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ ४७ ॥ तमप्यथ महात्मानं सर्वे ते पुरुषर्षभाः । पाद्यार्घ्याभ्यां यथान्यायमुपतस्थुर्मनीषिणः ॥ ४८ ॥ तब उन सभी श्रेष्ठ मनीषी पुरुषोंने उन महात्मा नारदजीको भी पाद्य आदि देकर उनका यथायोग्य सत्कार किया ॥ ४८ ॥