भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1248, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1248

सभी स्वच्छन्दतापूर्वक आकाशमार्गसे उड़कर देवताओंसे मिलने जाते और स्वच्छन्दचारी होनेके कारण इच्छा होते ही पुनः वहाँसे लौट आते थे। वे अपनी इच्छा होनेपर ही मरते और इच्छाके अनुसार ही जीवित रहते थे। स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे। उनके मार्गमें बाधाएँ बहुत कम आती थीं। उन्हें कोई भय नहीं होता था। वे उपद्रवशून्य तथा पूर्णकाम थे ।। ६५-६६ ।।

द्रष्टारो देवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् ।
प्रत्यक्षाः सर्वधर्माणां दान्ता विगतमत्सराः ।। ६७ ।।
देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके समुदायका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन होता था। वे सभी धर्मोंको प्रत्यक्ष करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा ईर्ष्यासे रहित होते थे ।। ६७ ।।

आसन् वर्षसहस्त्रीयास्तथा पुत्रसहस्रिणः ।
उनकी आयु हजारों वर्षोंकी होती थी और वे हजार-हजार पुत्र उत्पन्न करते थे ।। ६७ १/२ ।।

ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिणः ।। ६८ ।।
कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविनः ।
लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नराः ।। ६९ ।।
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये। वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे। उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया। इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा ।। ६८-६९ ।।

अशुभैः कर्मभिः पापास्तिर्यङ्निरयगामिनः ।
संसारेषु विचित्रेषु पच्यमानाः पुनःपुनः ।। ७० ।।
वे पापपरायण हो अपने अशुभ कर्मोंके फलस्वरूप पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें जाने और नरकमें गिरने लगे। विचित्र सांसारिक योनियोंमें बारंबार जन्म लेकर दुःखसे संतप्त होने लगे ।। ७० ।।

मोघेष्टा मोघसंकल्पा मोघज्ञाना विचेतसः ।
सर्वाभिशङ्किनश्चैव संवृत्ताः क्लेशदायिनः ।। ७१ ।।
उनकी कामनाएँ, उनके संकल्प और उनके ज्ञान सभी निष्फल थे। उनकी स्मरण-शक्ति क्षीण हो गयी थी। वे सभी परस्पर संदेह करते हुए एक-दूसरेके लिये क्लेशदायक बन गये ।। ७१ ।।

अशुभैः कर्मभिश्चापि प्रायशः परिचिह्निताः ।
दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानोऽप्रतापिनः ।। ७२ ।।
उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न (कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे। कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत-से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो