भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1249

जाते थे। उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था ॥ ७२ ॥ भवन्त्यल्पायुषः पापा रौद्रकर्मफलोदयाः । नाथन्तः सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतसः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार पापकर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाले पापियोंकी आयु उनके कर्मानुसार बहुत कम हो गयी। उनके पापकर्मोंके भयंकर फल प्रकट होने लगे। वे अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंके लिये दूसरोंके सामने हाथ फैलाकर याचना करने लगे। कितने ही नास्तिक और विचलितचित्त हो गये ॥ ७३ ॥ जन्तोः प्रेतस्य कौन्तेय गतिः स्वैरिह कर्मभिः । प्राज्ञस्य हीनबुद्धेश्च कर्मकोशः क्व तिष्ठति ॥ ७४ ॥ क्वस्थस्तत् समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत् । इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनयं शृणु ॥ ७५ ॥ कुन्तीनन्दन! इस संसारमें मृत्युके पश्चात् जीवकी गति उनके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही होती है। परंतु मरनेके बाद ज्ञानी और अज्ञानीकी कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो ॥ ७४-७५ ॥ अयमादिशरीरेण देवसृष्टेन मानवः । शुभानामशुभानां च कुरुते संचयं महत् ॥ ७६ ॥ आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम् । सम्भवत्येव युगपद् योनौ नास्त्यन्तराभवः ॥ ७७ ॥ यह मनुष्य ईश्वरके रचे हुए पूर्वशरीरके द्वारा (अन्तःकरणमें) शुभ और अशुभ कर्मोंकी बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है। फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा-जर्जर स्थूल शरीरका त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि (शरीर)-में प्रकट होता है। एक शरीरको छोड़ने और दूसरेको ग्रहण करनेके बीचमें क्षणभरके लिये भी वह असंसारी नहीं होता ॥ ७६-७७ ॥ तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा । फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वाथ जायते ॥ ७८ ॥ कृतान्तविधिसंयुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः । अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ॥ ७९ ॥ वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है। यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा