भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है ॥ ७८-७९ ॥

एषा तावदबुद्धीनां गतिरुक्ता युधिष्ठिर ।
अतः परं ज्ञानवतां निबोध गतिमुत्तमाम् ॥ ८० ॥
युधिष्ठिर! यह तत्त्वज्ञानशून्य मूढ़ मनुष्योंकी स्वर्ग-नरकरूप गति बतायी गयी है। अब इसके बाद विवेकी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिका वर्णन सुनो ॥ ८० ॥

मनुष्यास्तप्ततपसः सर्वागमपरायणाः ।
स्थिरव्रताः सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ ८१ ॥
सुशीलाः शुक्लजातीयाः क्षान्ता दान्ताः सुतेजसः ।
शुचियोन्यन्तरगताः प्रायशः शुभलक्षणाः ॥ ८२ ॥
ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्लाजातीय (सात्त्विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्रायः शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ८१-८२ ॥

जितेन्द्रियत्वाद् वशिनः शुक्लत्वान्मन्दरोगिणः ।
अल्पाबाधपरित्रासाद् भवन्ति निरुपद्रवाः ॥ ८३ ॥
च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः ।
स्वमात्मानं परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा ॥ ८४ ॥
जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात्त्विक अन्तःकरणके होनेके कारण नीरोग होते हैं। दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं। विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने-आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं ॥ ८३-८४ ॥

ऋषयस्ते महात्मानः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ।
कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालयम् ॥ ८५ ॥
लौकिक तथा शास्त्रीय ज्ञानको प्रत्यक्ष करनेवाले वे महामना ऋषि इस कर्मभूमिमें आकर फिर देवलोकमें चले जाते हैं ॥ ८५ ॥

किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वकर्मभिः ।
प्राप्नुवन्ति नरा राजन् मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ॥ ८६ ॥
राजन्! विवेकी मनुष्य कर्मोंका कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मोंका फल हठात् प्राप्त होता है और कुछ कर्मोंका फल अपने उद्योगसे ही प्राप्त होता है। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ८६ ॥

इमामत्रोपमां चापि निबोध वदतां वर ।
मनुष्यलोके यच्छ्रेयः परं मन्ये युधिष्ठिर ॥ ८७ ॥