महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह । इह वामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह ॥ ८८ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं। किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं। किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही ॥ ८७-८८ ॥
धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ॥ ८९ ॥
जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीरको हर तरहसे सजाकर नित्य विषयोंमें रमण करते अर्थात् विषय-सुख भोगते हैं। शत्रुसूदन! सदा अपने शरीरके ही सुखमें आसक्त हुए उन मनुष्योंको केवल इसी लोकमें सुख मिलता है, परलोकमें उनके लिये सुखका सर्वथा अभाव है ॥ ८९ ॥
ये योगयुक्तास्तपसि प्रसक्ताः स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहान् । जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ता- स्तेषामसौ नायमरिघ्न लोकः ॥ ९० ॥
शत्रुसूदन! जो लोग इस लोकमें योगसाधन करते हैं, तपस्यामें संलग्न होते हैं और स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं तथा इस प्रकार प्राणियोंकी हिंसासे दूर रहकर इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए (तपस्याद्वारा) अपने शरीरको दुर्बल कर देते हैं, उनके लिये इस लोकमें सुख नहीं है। वे परलोकमें ही परम कल्याणके भागी होते हैं ॥ ९० ॥
ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति धर्मेण लब्ध्वा च धनानि काले । दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते तेषामयं चैव परश्च लोकः ॥ ९१ ॥
जो लोग कर्तव्य-बुद्धिसे पहले धर्मका ही आचरण करते हैं और उस धर्मसे ही (न्याययुक्त) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ यज्ञ-याग और ईश्वरभक्ति आदिका अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं ॥ ९१ ॥
ये नैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढाः प्रजने यतन्ति ।