भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1259

तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥ ६ ॥ भृत्यान् सुतान् संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम् । एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥ ७ ॥ ‘वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अतः इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्षे! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये। धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है’ ॥ ६-७ ॥

अत्रिरुवाच

कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना । वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥ ८ ॥ अत्रि बोले—महाभागे! महात्मा गौतमने मुझसे कहा है कि ‘वेनपुत्र राजा पृथु धर्म और अर्थके साधनमें संलग्न रहते हैं। वे सत्यव्रती हैं’ ॥ ८ ॥ द्वेष्टारः किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजाः । यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाय्यहम् ॥ ९ ॥ परंतु एक बात विचारणीय है। वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है। इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा हूँ ॥ ९ ॥ तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् । मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥ १० ॥ यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युत कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे ॥ १० ॥ गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव । गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥ ११ ॥ तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है। राजा पृथु मुझे बहुत-सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे ॥ ११ ॥ एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः । गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥ १२ ॥ वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद् वचः । ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथुके यज्ञमें गये। यज्ञमण्डपमें पहुँचकर उन्होंने उस राजाका मांगलिक वचनोंद्वारा स्तवन किया और उनका समादर करते हुए इस प्रकार कहा ॥ १२ १/२ ॥

अत्रिरुवाच