भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1260

राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥ १३ ॥ अत्रि बोले— राजन्! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो ॥ १३ ॥

स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् । तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥ १४ ॥ महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है। उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा ॥ १४ ॥

गौतम उवाच

मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता । अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥ १५ ॥ गौतम बोलें— अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना। तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं ॥ १५ ॥

अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत । अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः । त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा— ‘मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं। तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है’ ॥ १६ ॥

गौतम उवाच

जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते । स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥ १७ ॥ गौतम बोले— मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो। मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो ॥ १७ ॥

न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम् । बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥ १८ ॥ उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है। तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो। मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्थासे बूढ़े हो ॥ १८ ॥

विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ । ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥ १९ ॥