भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1261

मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें

देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे—'ये दोनों कैसे लड़

रहे हैं? ॥ १९ ॥

प्रवेशः केन दत्तोऽयमुभयोर्वैन्यसंसदि ।

उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण धिष्ठितौ ॥ २० ॥

ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित् ।

विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥ २१ ॥

‘किसने इन दोनोंको महाराज पृथुके यज्ञमण्डपमें घुसने दिया है? ये दोनों जोर-जोरसे

बातें करते और झगड़ते यहाँ किस कामसे खड़े हैं?' उस समय परम धर्मात्मा एवं सम्पूर्ण

धर्मोंके ज्ञाता कणादने सब सदस्योंको बताया कि ये दोनों किसी विषयको लेकर परस्पर

विवाद कर रहे हैं और उसीके निर्णयके लिये यहाँ आये हैं' ॥

अथाब्रवीत् सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान् ।

आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः ॥ २२ ॥

वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान् ।

श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥ २३ ॥

सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै ।

स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः ।

प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥ २४ ॥

तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—'श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम

दोनोंके प्रश्नको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुको विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम

दोनोंमें महान् संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।' यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त

संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन

महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा

— ॥ २२-२४ ॥

सनत्कुमार उवाच

ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह ।

संयुक्तौ दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ २५ ॥

राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च ।

स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः ॥ २६ ॥

सनत्कुमार बोले—ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायँ तो वे दोनों

मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी