भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1270, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1270

प्रज्ञां च देवीं सुभगे बिभर्षि ॥ २३ ॥ तार्क्ष्यने पूछा— सुभगे! तुम्हारी-जैसी दूसरी कोई नारी नहीं है। तुम साक्षात् लक्ष्मीजीकी भाँति अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देती हो। तुम्हारा यह परम कान्तिमान् स्वरूप अत्यन्त दिव्य है। साथ ही तुम दिव्य प्रज्ञा भी धारण करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ २३ ॥

सरस्वत्युवाच

श्रेष्ठानि यानि द्विपदां वरिष्ठ यज्ञेषु विद्वन्नुपपादयन्ति । तैरेव चाहं सम्प्रवृद्धा भवामि चाप्यायिता रूपवती च विप्र ॥ २४ ॥ सरस्वती बोली— नरश्रेष्ठ! विद्वन्! याज्ञिकलोग यज्ञोंमें जो श्रेष्ठ कार्य करते हैं अथवा श्रेष्ठ वस्तुओंका संकलन करते हैं, उन्हींसे मेरी पुष्टि तथा तृप्ति होती है और विप्रवर! उन्हींसे मैं रूपवती होती हूँ ॥ २४ ॥

यच्चापि द्रव्यमुपयुज्यते ह वानस्पत्यमायसं पार्थिवं वा । दिव्येन रूपेण च प्रज्ञया च तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ॥ २५ ॥ विद्वन्! उन यज्ञोंमें जो समिधा-स्रुवा आदि वृक्षसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ, सुवर्ण आदि तैजस वस्तुएँ तथा व्रीहि आदि पार्थिव वस्तुएँ उपयोगमें लायी जाती हैं, उन्हींके द्वारा दिव्य रूप तथा प्रज्ञासे सम्पन्न मेरे स्वरूपकी पुष्टि होती है, यह बात तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ २५ ॥

तार्क्ष्य उवाच

इदं श्रेयः परमं मन्यमाना व्यायच्छन्ते मुनयः सम्प्रतीताः । आचक्ष्व मे तं परमं विशोकं मोक्षं परं यं प्रविशन्ति धीराः । सांख्या योगा परमं यं विदन्ति परं पुराणं तमहं न वेद्मि ॥ २६ ॥ तार्क्ष्यने पूछा— देवि! जिसे परम कल्याणस्वरूप मानते हुए मुनिजन अत्यन्त विश्वासपूर्वक इन्द्रियों आदिका निग्रह करते हैं तथा जिस परम मोक्ष-स्वरूपमें धीर पुरुष प्रवेश करते हैं, उस शोकरहित परम मोक्षपदका वर्णन करो; क्योंकि जिस परम मोक्षपदको सांख्ययोगी और कर्मयोगी जानते हैं, उस सनातन मोक्ष-तत्त्वको मैं नहीं जानता ॥ २६ ॥

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