महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसरस्वत्युवाच
तं वै परं वेदविदः प्रपन्नाः परं परेभ्यः प्रथितं पुराणम् । स्वाध्यायवन्तो व्रतपुण्ययोगै- स्तपोधना वीतशोका विमुक्ताः ॥ २७ ॥ सरस्वती बोली—स्वाध्यायरूप योगमें लगे हुए तथा तपको ही धन माननेवाले योगी व्रत-पुण्य और योगके साधनोंसे जिस प्रख्यात, परात्पर एवं पुरातन पदको प्राप्तकर शोकरहित तथा मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन ब्रह्मपद है। वेदवेत्ता उसी परमपदका आश्रय लेते हैं ॥ २७ ॥
तस्याथ मध्ये वेतसः पुण्यगन्धः सहस्रशाखो विपुलो विभाति । तस्य मूलात् सरितः प्रस्रवन्ति मधूदकप्रस्रवणाः सुपुण्याः ॥ २८ ॥ उस परब्रह्ममें ब्रह्माण्डरूपी एक विशाल बेंतका वृक्ष है, जो भोग-स्थानरूपी अनन्त शाखाओंसे युक्त तथा शब्दादि विषयरूपी पवित्र सुगन्धसे सम्पन्न है। (उस ब्रह्माण्डरूपी वृक्षका मूल अविद्या है।) उस अविद्यारूपी मूलसे भोगवासनामयी निरन्तर बहनेवाली अनन्त नदियाँ उत्पन्न होती हैं। वे नदियाँ ऊपरसे तो रमणीय और पवित्र सुवाससे युक्त प्रतीत होती हैं तथा मधुके समान मधुर एवं जलके समान तृप्तिकारक विषयोंको बहाया करती हैं ॥ २८ ॥
शाखां शाखां महानद्यः संयान्ति सिकताशयाः । धानापूपा मांसशाकाः सदा पायसकर्दमाः ॥ २९ ॥ परंतु वास्तवमें वे सब भूने हुए जौके समान फल देनेमें असमर्थ, पूओंके समान अनेक छिद्रोंवाली, हिंसासे मिल सकनेवाली अर्थात् मांसके समान अपवित्र, सूखे शाकके समान सारशून्य और खीरके समान रुचिकर लगनेवाली होनेपर भी कीचड़के समान चित्तमें मलिनता उत्पन्न करनेवाली हैं। बालूके कणोंके समान परस्पर विलग एवं ब्रह्माण्डरूपी बेंतके वृक्षकी शाखाओंमें बहनेवाली हैं ॥ २९ ॥
यस्मिन्नग्निमुखा देवाः सेन्द्राः सहमरुद्गणाः । ईजिरे क्रतुभिः श्रेष्ठैस्तत् पदं परमं मम ॥ ३० ॥ मुने! इन्द्र, अग्नि और पवन आदि मरुद्गणोंके साथ देवतालोग जिस ब्रह्मको प्राप्त करनेके लिये श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा उसका पूजन करते हैं, वह मेरा परमपद है ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि सरस्वतीताक्ष्यसंवादे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥