भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1276, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1276

तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय । अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥ शत्रुविजयी युधिष्ठिर! मनुने उसे वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षोंतक उसीमें क्रमशः बढ़ता रहा ॥ १६ ॥ द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम् । तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥ कमलनयन! उस बावलीकी लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजनकी थी; परंतु उसमें भी उस मत्स्यका रहना कठिन हो गया ॥ १७ ॥ विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते । मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥ नराधिप कुन्तीनन्दन! वह उस बावलीमें हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनुको देखकर वह पुनः बोला— ॥ १८ ॥ नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् । गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥ निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता । वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥ ‘भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गङ्गाजीमें ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ’ ॥ १९-२० ॥ एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी । नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥ मत्स्यके ऐसा कहनेपर जितेन्द्रिय, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् मनुने उसे स्वयं ले जाकर गङ्गामें डाल दिया ॥ २१ ॥ स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम । ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो । समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥ उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् । समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥ शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा—‘प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गङ्गाजीमें हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर