भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1277

इतनी कृपा अवश्य कीजिये।' कुन्तीनन्दन! तब मनुने स्वयं उस मत्स्यको गंगाजीके जलसे निकालकर समुद्रतक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया ॥ २२—२४ ॥

सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा । आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥ २५ ॥ राजन्! यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया, जिससे आसानीसे ले जाया जा सके। उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनुके लिये बड़े सुखकर थे ॥ २५ ॥

यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा । तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ २६ ॥ जब मनुने उस मत्स्यको समुद्रमें डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए-से कहा— ॥ २६ ॥

भगवन् हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः । प्राप्तकालं तु यत् कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥ २७ ॥ 'भगवन्! आपने विशेष मनोयोगके साथ सब प्रकारसे मेरी रक्षा की है, अब आपके लिये जिस कार्यका अवसर प्राप्त हुआ है, वह बताता हूँ, सुनिये— ॥ २७ ॥

अचिराद् भगवन् भौममिदं स्थावरजङ्गमम् । सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥ २८ ॥ 'भगवन्! यह सारा-का-सारा चराचर पार्थिव जगत् शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। महाभाग! सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलय हो जायगा ॥ २८ ॥

सम्प्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः । तस्मात् त्वां बोधयाम्यद्य यत् ते हितमनुत्तमम् ॥ २९ ॥ 'यह सब लोकोंके सम्प्रक्षालन (एकार्णवके जलसे धुलकर नष्ट होने)-का समय आ गया है। इसलिये मैं आपको सचेत करता हूँ और आपके लिये जो परम उत्तम हितकी बात है, उसे बताता हूँ ॥ २९ ॥

त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति । तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ॥ ३० ॥ 'सम्पूर्ण जंगमों तथा स्थावर पदार्थोंमें जो हिल-डुल सकते हैं और जो हिलने-डुलनेवाले नहीं हैं, उन सबके लिये अत्यन्त भयंकर समय आ पहुँचा है ॥ ३० ॥

नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका । तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥ ३१ ॥ 'आपको एक मजबूत नाव बनवानी चाहिये, जिसमें (मजबूत) रस्सी जुटी हो। महामुने! फिर आप सप्तर्षियोंके साथ उस नावपर बैठ जाइये ॥ ३१ ॥

बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि द्विजैः पुरा ।