भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1278, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1278

तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥ ३२ ॥ ‘पूर्वकालमें ब्राह्मणोंने जो सब प्रकारके बीज बताये हैं, उनका पृथक्-पृथक् संग्रह करके उन्हें सुरक्षितरूपसे उस नावपर रख लें’ ॥ ३२ ॥ नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय । आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥ ३३ ॥ एवमेतत् त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् । ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना ॥ ३४ ॥ ‘मुनिजनोंके प्रेमी तपस्वी नरेश! उस नावमें बैठे रहकर आप मेरी प्रतीक्षा कीजियेगा। मैं आपके पास अपने मस्तकमें सींग धारण किये आऊँगा। उसीसे आप मुझे पहचान लेंगे। इस प्रकार यह सब कार्य आपको करना है। अब मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ और यहाँसे जाता हूँ। उस महान् जलराशिको आपलोग मेरी सहायताके बिना पार नहीं कर सकेंगे’ ॥ ३३-३४ ॥ नाभिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो । एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत ॥ ३५ ॥ ‘प्रभो! आप मेरी इस बातमें तनिक भी संदेह न करें।’ तब राजाने उस मत्स्यसे कहा—‘बहुत अच्छा! मैं ऐसा ही करूँगा’ ॥ ३५ ॥ जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् । ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह ॥ ३६ ॥ बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा । नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन! वे दोनों एक-दूसरेसे विदा लेकर इच्छानुसार वहाँसे चले गये। महाराज! तदनन्तर मनु मत्स्यभगवान्‌के कथनानुसार सम्पूर्ण बीज लेकर एक सुन्दर नौकाद्वारा उत्ताल तरंगोंसे भरे हुए महासागरमें तैरने लगे ॥ ३६-३७ ॥ चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय ॥ ३८ ॥ शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम । तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे ॥ ३९ ॥ शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् । वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥ शत्रुनगरविजयी नरेश्वर! तदनन्तर मनुने भगवान् मत्स्यका चिन्तन किया। यह जानकर शृंगधारी भगवान् मत्स्य वहाँ शीघ्र आ पहुँचे। नरश्रेष्ठ भरतकुलशिरोमणे! समुद्रमें अपने पूर्वकथित रूपसे ऊँचे पर्वतकी भाँति शृंगधारी मत्स्य भगवान्‌को आया देख उनके मस्तकवर्ती सींगमें उन्होंने बँटी हुई रस्सी बाँध दी ॥ ३८—४० ॥

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