भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1313, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1313

लोग एक-दूसरेको लूटेंगे और मारेंगे। युगान्तकालके मनुष्य जपरहित, नास्तिक और चोरी करनेवाले होंगे ॥ २२ ॥ सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वपयिष्यन्ति चौषधीः । ताश्चाप्यल्पफलास्तेषां भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २३ ॥ नदियोंके किनारेकी भूमिको कुदालोंसे खोदकर लोग वहाँ अनाज बोयेंगे। उन अनाजोंमें भी युगान्तकालके प्रभावसे बहुत कम फल लगेंगे ॥ २३ ॥ श्राद्धे दैवे च पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः । तेऽपि लोभसमायुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ॥ २४ ॥ जो सदा (परान्नका त्याग करके) व्रतका पालन करनेवाले लोग हैं, वे भी उस समय लोभवश देवयज्ञ तथा श्राद्धमें एक-दूसरेके यहाँ भोजन करेंगे ॥ २४ ॥ पिता पुत्रस्य भोक्ता च पितुः पुत्रस्तथैव च । अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २५ ॥ कलियुगके अन्तिम भागमें पिता पुत्रकी और पुत्र पिताकी शय्या आदिका उपभोग करने लगेंगे। उस समय त्याज्य (अभक्ष्य) पदार्थ भी भोजनके योग्य समझे जायँगे ॥ २५ ॥ न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः । न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः । निम्नेष्वीहां करिष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ॥ २६ ॥ ब्राह्मणलोग व्रत और नियमोंका पालन तो करेंगे नहीं, उलटे वेदोंकी निन्दा करने लग जायँगे। कोरे तर्कवादसे मोहित होकर वे यज्ञ और होम छोड़ बैठेंगे। वे केवल तर्कवादसे मोहित होकर नीच-से-नीच कर्म करनेके लिये प्रयत्नशील रहेंगे ॥ २६ ॥ निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः । एकहायनवत्सांश्च योजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २७ ॥ मनुष्य नीची भूमिमें (अर्थात् गायोंके जल पीने और चरनेकी जगहमें) खेती करेंगे। दूध देनेवाली गायोंको भी बोझ ढोनेके काममें लगा देंगे और सालभरके बछड़ोंको भी हलमें जोतेंगे ॥ २७ ॥ पुत्रःपितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा । निरुद्वेगो बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ २८ ॥ पुत्र पिताका और पिता पुत्रका वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे। अपनी प्रशंसाके लिये लोग बड़ी-बड़ी बातें बनायेंगे, किंतु समाजमें उनकी निन्दा नहीं होगी ॥ २८ ॥ म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं निष्क्रियं यज्ञवर्जितम् । भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ॥ २९ ॥ सारा संसार म्लेच्छोंकी भाँति शुभ कर्म और यज्ञ-यागादि छोड़ देगा तथा आनन्दशून्य और उत्सवरहित हो जायगा ॥ २९ ॥

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