भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1314, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1314

प्रायशः कृपणानां हि तथाबन्धुमतामपि । विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥ ३० ॥ लोग प्रायः दीनों, असहायों तथा विधवाओंका भी धन हड़प लेंगे ॥ ३० ॥ स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः । तत्कथादानसंतुष्टा दुष्टानमपि मानवाः ॥ ३१ ॥ परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः । समाह्वयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥ ३२ ॥ परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः । भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥ ३३ ॥ उनके शारीरिक बल और पराक्रम क्षीण हो जायँगे। वे उद्दण्ड होकर लोभ और मोहमें डूबे रहेंगे। वैसे ही लोगोंकी चर्चा करने और उनसे दान लेनेमें प्रसन्नताका अनुभव करेंगे। कपटपूर्ण आचारको अपनाकर वे दुष्टोंके दिये हुए दानको भी ग्रहण कर लेंगे। कुन्तीनन्दन! पापबुद्धि राजा एक-दूसरेको युद्धके लिये ललकारते हुए परस्पर एक-दूसरेके प्राण लेनेको उतारू रहेंगे और मूर्ख होते हुए अपनेको पण्डित मानेंगे। इस प्रकार युगान्तकालके सभी क्षत्रिय जगत्के लिये काँटे बन जायँगे ॥ ३१—३३ ॥ अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः । केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ३४ ॥ कलियुगकी समाप्तिके समय वे प्रजाकी रक्षा तो करेंगे नहीं, उनसे रुपये ऐंठनेके लिये लोभ अधिक रखेंगे। सदा मान और अहंकारके मदमें चूर रहेंगे। वे केवल प्रजाको दण्ड देनेके कार्यमें ही रुचि रखेंगे ॥ ३४ ॥ आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च । भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥ ३५ ॥ भारत! लोग इतने निर्दयी हो जायँगे कि सज्जन पुरुषोंपर भी बार-बार आक्रमण करके उनके धन और स्त्रियोंका बलपूर्वक उपभोग करेंगे तथा उनके रोने-बिलखनेपर भी दया नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥ न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते । स्वयंग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥ कलियुगका अन्त आनेपर न तो कोई किसीसे कन्याकी याचना करेगा और न कोई कन्यादान ही करेगा। उस समयके वर-कन्या स्वयं ही एक-दूसरेको चुन लेंगे ॥ राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान् मूढचेतसः । सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३७ ॥ कलियुगकी समाप्तिके समय असंतोषी तथा मूढ़चित्त राजा भी सब तरहके उपायोंसे दूसरोंके धनका अपहरण करेंगे ॥ ३७ ॥

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